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Wednesday, August 6, 2014

गढ़कुंडार की ख़ामोशी

यौवन का रसिया जग सारा ,
बना रहे जब तक सिंगार !
सकल साधना चुक जाती है ,
मित्थ्याकर्षण का आधार !
देख मनुज की दुर्बलता को ,
ही ख़ामोशी ओढ़ गया !
न उपेक्षा न ही इच्छा अब ,
पाला करता गढ़ कुंडार !!
......................"अशोक सूर्यवेदी"

Tuesday, August 5, 2014

"गुरु गढ़कुंडार"

दुनियाँ भर की पोथीं पढ़ लो ,
ग्रंथों वेदों का भी सार !
जीवन स्नातक हो जाओगे ,
आ जाओ बस इक ही बार !
जीवन की शाला का दर्शन ,
यहाँ रमा है कण कण में !
शाश्वत सत्य का पाठ पढाता ,
रहकर मौन भी गढ़ कुंडार !!
..................."अशोक सूर्यवेदी"

Monday, August 4, 2014

"शाश्वत सत्य और गढ़कुंडार"

झूठी रीती झूठी प्रीती ,
झूठे रिश्ते नातेदार !
झूठे बंधन झूठी माया ,
झूठा है यह संसार !
दुनियां भर के भोग भोगकर ,
सेज मिलेगी शोलों की !
शाश्वत सत्य जगत में एक ही ,
बोध कराता गढ़ कुंडार !!
..............."अशोक सूर्यवेदी"

Sunday, August 3, 2014

नील कंठ सा गढ़ कुंडार

सत्ता के उत्थान पतन में,
हक में आई जीत न हार !
नियति नटी ने निर्णायक बन ,
माथा झूठ को बारम्बार !
सागर "समय" के मंथन में तब ,
द्वेष भाव का विष निकला !
अपमानों का गरल गटक है ,
नीलकंठ सा गढ़ कुंडार !!
.............."अशोक सूर्यवेदी"

Thursday, July 31, 2014

"गढ़कुंडार की नीरवता"

शासन सत्ता न्योता देते ,
और बुलाते आग व धार !
दरबारों की रौनकता पर ,
शीश कटाते बारम्बार !
कर्कशा ,कुटिल ,कौटाली थी ,
तजी ,रौनकता यह जान !
रचा कर नीरवता से व्याह ,
मौज मनाता गढ़ कुंडार !!
.............."अशोक सूर्यवेदी"

Wednesday, July 30, 2014

"लुकाछिपी गढ़कुंडार की"

मंजिल पास आ जाती है तो ,
आड़े आता है संसार !
रोड़े और रूकावट है भ्रम ,
लौट न जाना तू थक हार !
इसकी जटिल भुगौलिक रचना ।
हृदय भाँपती आगत का !
सो पथिक से लुकाछिपी सी ,
करता रहता गढ़ कुंडार !!
..........."अशोक सूर्यवेदी"

Sunday, July 27, 2014

"देख चुका है गढ़कुंडार"

शौर्य वीरता के दिन देखे ,
भोगे बिलास बेशुमार !
सदा न शासक रहे चंदेले ,
रह न पाए राय खंगार !
ये शासन सत्ता राजलक्ष्मी ,
एक जगह कब ठहरे हैं ?
कैसे कैसे रूप बदलते ,
देख चुका है गढ़ कुंडार !!

"अशोक सूर्यवेदी"

Saturday, July 26, 2014

"बतलाता है गढ़कुंडार"

जुल्मी , हुकूमत , तानाशाही ,
पाप , अराजक , व्यभिचार !
ये फसलें हैं कितने दिन की ?
लहरा लें दिन दो या चार !
आतंक रहा न रावण का ,
ना सदा कंस की सत्ता ही!
समय मसीहा बनकर आता ,
बतलाता है गढ़ कुंडार !!

Thursday, July 24, 2014

यही सिखाता गढ़कुंडार

रहे न राजा रजवाड़े ,
न महारानी राजकुमार !
न महलों में तुरही बजती ,
न ही सजते हैं दरबार !
राज बदल गए न्रपतियों के ,
राजलक्ष्मी भी जा सोयी !
पर यश अपयश सदा जियेंगे ,
यही सिखाता गढ़ कुंडार !!
....................."अशोक सूर्यवेदी"

Wednesday, July 23, 2014

" कुंडार दर्शन "

इतिहासों के जर्जर पन्ने ,
खंडहरों के दर्द शुमार !
गूँथ के लाया तुकबंदी में ,
गए महलों के आंसू चार !
मुझको कविता की समझ नही ,
मत कवि कहना मुझे मगर !
तुम्हे सुनाऊंगा मैं सब जो ।
कहता मुझसे गढ़ कुंडार !!
................." अशोक सूर्यवेदी "