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ओ गौरव के महा महल तुम , किस कारण बदनाम हुए !
इतिहासों के पन्नों में भी , किस कारण गुमनाम हुए !
मैंने ढूंढा इतिहासों में , मुझे न तेरा नाम मिला !
और देख कर लगता तुझको , मुझको मेरा धाम मिला !
वीर तुम्हारे सीने पर है , अंकित बलिदानी गाथा !
पत्थर पत्थर बोल रहा है , स्वाभिमान से है नाता !
करधई के पेड़ों में तेरे , पुत्रों का रक्त प्रवाहित है !
सो निर्जन में अब तक तू , पहरे में इनके रक्षित है !
जब तेरा युग होगा तुझसे , अरि तेरा डरता होगा !
और मित्र तेरा तेरे बल पर , ही दम भरता होगा !
तुझसे भय खाते होंगे सब , यवनों के लश्कर डेरे!
सदा चाहते होंगे वे यह , डाले तुझ पर मिल घेरे !
तेरे वीरों के आगे ना , उनकी कभी चली होगी !
उनके अरमानो की चिता सदा , रण में यहीं जली होगी !
अनहोनी होनी हुयी होगी , तेरे भी तो साथ कहीं !
तूने भी तो खाई होगी , गद्दारों से मात कहीं !
तुझको तो आये होंगे , लोभ उन चाँद सितारों के !
हरी पताका वालों के उन , हिन्दू जन गण के हत्त्यारों के !
पर तूने ठुकराया होगा , उन सब को तलवारों से !
तुझको प्यारा होगा तेरा , राष्ट्र धर्म हत्त्यारों से !
आँगन कि शिला ये कहती है , कि तेरी भी इक बिटिया थी !
तेरे होंठों कि लाली थी , और मांथे की बिंदिया थी !
उस पर जब यौवन आया था , पुरनूर फिजा पर छाया था !
उसके यौवन का गीत स्वयं , हवा ने शायद गाया था !
तेरी तो नज़र पिता की थी, तेरे लिए वह बच्ची थी !
पर उसके यौवन की चर्चा , दिल्ली तक में चलती थी !
कुछ लोग खफा जो तुझसे थे , साकी हुए वो दिल्ली में !
राष्ट्रधर्म ताज महापाप के भागी हुए वो दिल्ली में !
दिल्ली का शासक 'बिन तुगलक' ,स्वर्ण सुंदरी का भोगी !
हिन्दू रोधी क्रूर कौटाली विस्तारवादिता का रोगी !
उसकी राज्याकांक्षा में तू , खड़ा हुआ था पर्वत सा !
जिस पर माथा पीट हताहत , रहता था वह गर्दभ सा !
तेरी जटिल भुगौलिक रचना , औ' तेरा एकाकी पन !
होंसले उनके देता तोड़ , जो भी आते तुझ पर तन !
घर का भेदी लंका ढाए , उसकी भी अभिलाषा थी !
राष्ट्रधर्म की सीख जुझारू , उसकी राह की बाधा थी !
गद्दार ने सारे भेद बता , जब अरि उकसाया होगा !
तब भी तेरा पौरुष ज्ञाता , अरि दिल घबराया होगा !
गद्दारों का बल पा दिल्ली , चढ़ आयी जब वीरों पर !
तभी तुम्हारी नजर पड़ी थी , धूल चढ़ी तस्वीरों पर !
काश ना जीवित छोड़ा होता , बांदी की औलादों को !
तो फिर घात ना होने पाती , देश धरम के वादों को !
नहीं समर में यहीं शहर में , अरि दल ने तुझको घेरा था !
दिल्ली की विशाल वाहिनी , का पड़ा नगर में डेरा था !
तुगलक ने फरमान दिया था , राजकुंवारी दे दास बनो !
गढ़ पर तानो हरी पताका , फिर दिल्ली के खास बनो !
दिल्ली का फरमान जानकर , नैनों के अंगार जगे !
जूझ के जीने मरने वाले , तेरे पुत्र खंगार जगे !
हर हर हर हर महादेव के , नारे गूंज गए रण में !
तेरी खातिर कितने ही सिर , भेंट चढ़े थे हर क्षण में !
तेरे पुत्र खंगार धनी थे , रण में बज्र प्रहारों के !
अरि दल भय खाते थे आगे , आने में अंगारों के !
जब नौ महीने तक चला युद्ध , और ना कोई परिणाम मिला !
तब अनहोनी ने रचा कुचक्र , और हुआ बदनाम किला !
मदनपाल और हरिसिंह दो , दासी पुत्र खंगारों से !
जूझे मरे अचानक अपनी , तलवारों के वारों से !
जब गिरा रक्त गजानन मां पर , मर्यादा शक्ति की टूटी !
और जुझौती बसुंधरा की , किस्मत वहीँ से थी फूटी !
बजी पलट गयी रण में औ' , रणचंडी प्रतिकूल हुयी !
फिर भी लड़ते रहे बहादुर , और कुर्वानी की चूल हुयी !
जब शेष बचीं कुछ तलवारें औ' , नहीं विजय की आस बची !
तब स्वाभिमान बचाने तेरा , जौहर की थी आग रची !
तेरी बिटिया होम हुयी थी , राष्ट्र धर्म की वेदी में !
और नहीं कुछ पाया था , घर के ही उस भेदी ने !
सदियों तक वो रहा गुलाम , जो कुल सत्ता में आया !
स्वाभिमान की तेरी आभा , देख वो हर पल घबराया !
उसका इतिहास गुलामी का , तेरा था आज़ादी का !
जूझना परम्परा में तेरी , पर वह अवसरवादी था !
जूझना परम्परा तेरी , यदि ना विसराई जाती वो !
भारत मां पराधीन सदियों तक , ना पायी जाती तो !
यवन मुग़ल अंग्रेजों की जब , जूती शासन शीश धरे !
तब तेरे आँगन कौन जलाकर उजियारे के दीप धरे !
तेरी सीख जुझारू भूले , जनता उनकी जय बोले !
इतिहासों ने इसीलिए कुछ , कल्पित पन्ने धर खोले !
तेरे स्वर्णिम पन्ने फाड़े , अपना पाप छुपाने को !
और किया बदनाम तुझे , निज अपराध दवाने को !
कोयल का गौना गिद्धों संग , जब नियति की इच्छा बन जाये !
बगुला भगतों से हंसों को , फिर कौन सुरक्षित रख पाए !
ओ गौरव के महामहल तुम , इस कारण बदनाम हुए !
इतिहासों के पन्नो से भी इस कारण गुमनाम हुए !
तेरी तो नज़र पिता की थी, तेरे लिए वह बच्ची थी !
पर उसके यौवन की चर्चा , दिल्ली तक में चलती थी !
कुछ लोग खफा जो तुझसे थे , साकी हुए वो दिल्ली में !
राष्ट्रधर्म ताज महापाप के भागी हुए वो दिल्ली में !
दिल्ली का शासक 'बिन तुगलक' ,स्वर्ण सुंदरी का भोगी !
हिन्दू रोधी क्रूर कौटाली विस्तारवादिता का रोगी !
उसकी राज्याकांक्षा में तू , खड़ा हुआ था पर्वत सा !
जिस पर माथा पीट हताहत , रहता था वह गर्दभ सा !
तेरी जटिल भुगौलिक रचना , औ' तेरा एकाकी पन !
होंसले उनके देता तोड़ , जो भी आते तुझ पर तन !
घर का भेदी लंका ढाए , उसकी भी अभिलाषा थी !
राष्ट्रधर्म की सीख जुझारू , उसकी राह की बाधा थी !
गद्दार ने सारे भेद बता , जब अरि उकसाया होगा !
तब भी तेरा पौरुष ज्ञाता , अरि दिल घबराया होगा !
गद्दारों का बल पा दिल्ली , चढ़ आयी जब वीरों पर !
तभी तुम्हारी नजर पड़ी थी , धूल चढ़ी तस्वीरों पर !
काश ना जीवित छोड़ा होता , बांदी की औलादों को !
तो फिर घात ना होने पाती , देश धरम के वादों को !
नहीं समर में यहीं शहर में , अरि दल ने तुझको घेरा था !
दिल्ली की विशाल वाहिनी , का पड़ा नगर में डेरा था !
तुगलक ने फरमान दिया था , राजकुंवारी दे दास बनो !
गढ़ पर तानो हरी पताका , फिर दिल्ली के खास बनो !
दिल्ली का फरमान जानकर , नैनों के अंगार जगे !
जूझ के जीने मरने वाले , तेरे पुत्र खंगार जगे !
हर हर हर हर महादेव के , नारे गूंज गए रण में !
तेरी खातिर कितने ही सिर , भेंट चढ़े थे हर क्षण में !
तेरे पुत्र खंगार धनी थे , रण में बज्र प्रहारों के !
अरि दल भय खाते थे आगे , आने में अंगारों के !
जब नौ महीने तक चला युद्ध , और ना कोई परिणाम मिला !
तब अनहोनी ने रचा कुचक्र , और हुआ बदनाम किला !
मदनपाल और हरिसिंह दो , दासी पुत्र खंगारों से !
जूझे मरे अचानक अपनी , तलवारों के वारों से !
जब गिरा रक्त गजानन मां पर , मर्यादा शक्ति की टूटी !
और जुझौती बसुंधरा की , किस्मत वहीँ से थी फूटी !
बजी पलट गयी रण में औ' , रणचंडी प्रतिकूल हुयी !
फिर भी लड़ते रहे बहादुर , और कुर्वानी की चूल हुयी !
जब शेष बचीं कुछ तलवारें औ' , नहीं विजय की आस बची !
तब स्वाभिमान बचाने तेरा , जौहर की थी आग रची !
तेरी बिटिया होम हुयी थी , राष्ट्र धर्म की वेदी में !
और नहीं कुछ पाया था , घर के ही उस भेदी ने !
सदियों तक वो रहा गुलाम , जो कुल सत्ता में आया !
स्वाभिमान की तेरी आभा , देख वो हर पल घबराया !
उसका इतिहास गुलामी का , तेरा था आज़ादी का !
जूझना परम्परा में तेरी , पर वह अवसरवादी था !
जूझना परम्परा तेरी , यदि ना विसराई जाती वो !
भारत मां पराधीन सदियों तक , ना पायी जाती तो !
यवन मुग़ल अंग्रेजों की जब , जूती शासन शीश धरे !
तब तेरे आँगन कौन जलाकर उजियारे के दीप धरे !
तेरी सीख जुझारू भूले , जनता उनकी जय बोले !
इतिहासों ने इसीलिए कुछ , कल्पित पन्ने धर खोले !
तेरे स्वर्णिम पन्ने फाड़े , अपना पाप छुपाने को !
और किया बदनाम तुझे , निज अपराध दवाने को !
कोयल का गौना गिद्धों संग , जब नियति की इच्छा बन जाये !
बगुला भगतों से हंसों को , फिर कौन सुरक्षित रख पाए !
ओ गौरव के महामहल तुम , इस कारण बदनाम हुए !
इतिहासों के पन्नो से भी इस कारण गुमनाम हुए !
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रचना:-
अशोक सूर्यवेदी