Monday, July 28, 2014

को जाय चमरौरे कान ...?

डुकर बाबा घर की चिक चिक से दूर बेड़ा में सोन परन लगे ते , "उतयीं कलेवा उतयीं व्याई " जौ बंदोवस्त लरका बऊ ने कर दओ तो , डुक्को संजा सबेरें बेड़ा में रोटी के संगै " चार चोटिया " भी मौका बेमौका पकरा आउत तीं !
एक दिना की बात घरै सास बऊ में ठन गयी खूब "रांड़ें मुंडी" भईं  ! रोटी की बेरा कड़ गयी लराई में , डुक्को मों फ़ुलै कें चौंतरा पै बैठ गयीं और बऊधन गोबर लैकें द्वारौ लीपन लगीं !
उतै बेड़ा में डुक्को रोटी दैवे न पौंची , सूरज बिलात ऊपर लौ चढ़ आओ , डुकर बाबा की आंतें कुन्नान लगीं तो डुकर बाबा लठिया लेकें , खुदयीं घर ताँय टिरक चले ! गली में घुसतनईं डुक्को और बऊधन द्वायें दिखानी , बूड़े कीं आँखें ताड़ गयी कै घरै "धीनक धीना" हो गओ !
डुकर ने डुक्को सें मसकरी के लाने कई :- आज  काये मच गओ लीपक लीपा ...?
डुक्को तौ भरीं बैठीं तीं सो तपाक से बऊ की पोल खोलती बोलीं :-" बऊ नें आ न्यौत बुलाओ छीपा "
बऊ काये चुप राती ऊने सास की उघार बे खां कई :- "दद्दा सुनों हमारी बानी , बाई बुलाय आईं पंडित ग्यानी"
इतेक में डुकर कौ लरका आ गओ ऊने जानी घरै आज कछू "दार बरी" कौ औसर आ है सौ अपनी मनवासन खां बुलाबे की सिफारस के लाने बोल परो :- "इतनी धूम धाम मचाई तौ काये न धोबन गयी बुलाई "
बब्बा की बिन्नू कड़ भगीं इतेक में उनने सुनी , और सोची सब आयें तो हमाव मन बसिया काय रे जाबे सौ साद के उनयीं ने कै डारी :- "कछुक तातौ कछुक बासौ, थोरौ भौत कडेरौ खातो".....
डुकर ने सबकी सुनी और मन मसोश  कें जा कत पौर में कड़ गये कै "अपनी अपनी परी है आन को जात अब चमरौरे कान"..........हती किसा हो गयी....!!

लोकसाहित्य से विलुप्त हो रही लोककथा (किसा) को शब्द देने की एक कोशिश मात्र ......."अशोक सूर्यवेदी"

Sunday, July 27, 2014

" मैं शिला लेख का पत्थर हूँ "

भाट नहीं हूँ ना कोई चारण ,
जो बिरुदावली बखान करूँ !
शासन सत्ता राजमहल का ,
क्यों कर मैं गुणगान करूँ !
पीड़ा हूँ मैं जन गण मन की ,
खून सना संबोधन हूँ!
राजमहल से प्रश्न पूंछता ,
चौबारों का उद्बोधन हूँ !
केवल सच ही मेरी शैली है,
मैं दर्पण सा प्रतिउत्तर हूँ !
मैं झाँसी बाला बेटा हूँ ,
मैं शिला लेख का पत्त्थर हूँ !
ना चरण चूमना वंदन करना ,
पलक बिछाना सरकारों को !
जूझ के जीना जूझ के मरना,
ये आदत हम फनकारों को !
हमने हरदम डांट लगाई ,
सब कर्महीन दरवारों को !
राजतन्त्र से प्रजा तंत्र तक,
सब बेगैरत सरकारों को !
यदि विपत्ति में हो कोयल ,
गीत नहीं वो गाती है !
पिंजरे में हो मैना तो फिर,
नहीं मधुमास मनाती है !
तो क्या हम इनसे भी,
गए गुजरे इंसानों के भेष में !
कैसे हम मधुमास लिखें ,
जब आग लगी हो देश में !
मेरी आँखों में लावा है ,
विश्वास मुझे तुम शीतल दो !
शस्य श्यामला भू पर मुझको ,
मुस्कानों का समतल दो !
तो फिर मैं भी गीत लिखूंगा ,
पावस के अभिनन्दन के !
लेकिन पहले बंद करा दो ,
स्वर करुणा के क्रंदन के !
जिस दिन झोपड़ियों का आंसू ,
मुस्कान बना लेगें हम !
ना दिखे चाँद पर उस दिन ,
ईद मना लेंगे हम !!!!!!!!!

"देख चुका है गढ़कुंडार"

शौर्य वीरता के दिन देखे ,
भोगे बिलास बेशुमार !
सदा न शासक रहे चंदेले ,
रह न पाए राय खंगार !
ये शासन सत्ता राजलक्ष्मी ,
एक जगह कब ठहरे हैं ?
कैसे कैसे रूप बदलते ,
देख चुका है गढ़ कुंडार !!

"अशोक सूर्यवेदी"

Saturday, July 26, 2014

" चलो दीपक जलाता हूँ "

अँधेरा है , मगर फिर भी,चलो दीपक जलाता हूँ !!

निशा ने आज ठाना है ,
रौशनी होने न देगी !
होगा नहीं उजाला अब ,
धरा अम्बर को तरसेगी !

तिमिर से मैं , मगर फिर भी , सदा विपरीत जाता हूँ !
अँधेरा है , मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!

मेघों ने कहा हुंकार ,
कर ले दासता स्वीकार !
चाँद तारे सभी तेरे ,
छुपे देखो मुझसे हार !

मगर निष्ठा मेरी ज्योति , उसे ही आजमाता हूँ !
अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!

अँधेरे का देखो राज ,
मूक है सारा विज्ञ समाज !
सक्षम जो करते प्रतिरोध ,
नदारद उसको देकर ताज !

मेरी हस्ती है छोटी सी , तो खुद को ज्वाल बनाता हूँ !
अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !

प्रलय का दम घटा भरती ,
सहमती काँपती धरती !
तिमिर के राज में कुछ भी ,
रहेगा शेष कहीं नहीं !

प्रलय से मैं नहीं डरता , सृजन के गीत गाता हूँ !
अँधेरा है , मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !"
       ........"अशोक सूर्यवेदी"......

"बतलाता है गढ़कुंडार"

जुल्मी , हुकूमत , तानाशाही ,
पाप , अराजक , व्यभिचार !
ये फसलें हैं कितने दिन की ?
लहरा लें दिन दो या चार !
आतंक रहा न रावण का ,
ना सदा कंस की सत्ता ही!
समय मसीहा बनकर आता ,
बतलाता है गढ़ कुंडार !!

Thursday, July 24, 2014

यही सिखाता गढ़कुंडार

रहे न राजा रजवाड़े ,
न महारानी राजकुमार !
न महलों में तुरही बजती ,
न ही सजते हैं दरबार !
राज बदल गए न्रपतियों के ,
राजलक्ष्मी भी जा सोयी !
पर यश अपयश सदा जियेंगे ,
यही सिखाता गढ़ कुंडार !!
....................."अशोक सूर्यवेदी"

Wednesday, July 23, 2014

" कुंडार दर्शन "

इतिहासों के जर्जर पन्ने ,
खंडहरों के दर्द शुमार !
गूँथ के लाया तुकबंदी में ,
गए महलों के आंसू चार !
मुझको कविता की समझ नही ,
मत कवि कहना मुझे मगर !
तुम्हे सुनाऊंगा मैं सब जो ।
कहता मुझसे गढ़ कुंडार !!
................." अशोक सूर्यवेदी "