Wednesday, October 19, 2011

" गढ़ कुंडार कैमरे की नजर से "

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गढ़ कुंडार महामहल का दक्षिणी प्रष्ठ
(गंज  से लिया गया चित्र )

गढ़ कुंडार महामहल  का सिंह द्वार 

सिंह पौर से लिया गया महामहल  का प्राकृतिक सुषमा  से युक्त चित्र 

गढ़ कुंडार महा महल का उत्तरी प्रष्ठ 
( जौहर बाबड़ी से लिया गया चित्र  )
चित्र में दिखाई दे रहे हैं मोहम्मद नईम




गढ़ कुंडार महा महल का मुख्य द्वार

महल के आँगन में रानी बैठक में मो० नईम 

मुख्य द्वार के बाहर उत्तरी ओर आराम के क्षणों में अशोक सूर्यवेदी

प्लेटफॉर्म पर पोस देते मो०नईम 
( पीछे गिद्धवाहिनी मां के  मंदिर का विहंगम द्रश्य  )

अशोक सूर्यवेदी 

अशोक सूर्यवेदी

जौहर बाबड़ी और मो0 नईम

जौहर बाबड़ी से राजप्रसाद का विहंगम द्रश्य 

मो0 नईम जौहर बाबड़ी पर पोज  देते हुए 
पीछे गढ़ कुंडार का उत्तरी प्रष्ट


अशोक सूर्यवेदी फुरसत के क्षणों में योग मुद्रा में 

अशोक सूर्यवेदी फुरसत  के क्षणों में योग मुद्रा में  

जौहर बाबड़ी 

मो० नईम गढ़ कुंडार में 

Friday, May 13, 2011

Garh Kundar At A Glance...















Tuesday, March 15, 2011

अधिकारी

एक  सरकारी अधिकारी ने चुनाव के समय मौका भांपकर .
एक भविष्यगामी सत्तापेक्षी प्रत्याशी पर दांव लगाया .
पद दुरूपयोग की सीमा तक काम और भारी भरकम खर्च भी उठाया .
चुनाव में सब खर्च ठीक ठाक कैसे चल रहा है नेता जी ने पता लगाया . 
उन दान मूर्ति भामाशाह को बुलाकर अपने गले लगाया 
उसने पूंछा श्रीमान आप यह सब मेरे लिए क्यों कर रहे हैं .
हम तो जनता के प्यार के मारे वैसे भी मर रहे हैं . 
आपने बहुत किया अब बस बस कीजिये .
मुझसे जो भी काम हो निः संकोच कह दीजिये .
अधिकारी बोला श्रीमान   क्षमा कीजिये हुज़ूर .
काम तो मेरा खास नहीं पर  आपमें मिनिस्टर बनने का है शुरूर  .
आप विधायक बनकर मंत्रीमंडल की शोभा बढ़ाएंगे.
बस उस समय ही हम अपना छोटा सा काम बताएँगे. 
जिसे आप कर भी देंगे और हम आपके गुण भी गायेंगे .
और अगले चुनाव में दूनी ताकत से आपके  काम भी आयेंगे .
भाग्यबस वह नेताजी चुनाव भी जीते और मंत्री भी बन गए .
उनके घर वाले और समर्थक भी सूखी लकड़ी से तन गए .
किसी दिन वह अधिकारी महोदय मंत्री जी से मिलने आये .
उन्होंने अपने काम बताये सुनकर भी मंत्री जी की समझ न आये .
बोले देखिये साफ़ साफ़ बताएं हम आप जैसे अधिकारी को सस्पेंड क्यों कराएँ .
यह हमसे किसी प्रकार नहीं बन सकता की हम आप को नुक्सान पहुंचाएं .
अधिकारी बोला श्रीमान आप हमें भ्रष्टाचार और पद दुरूपयोग आरोपों में हटाने का आदेश कीजिये .
आपकी शोहरत में चार चाँद लग जायेंगे और हमारी भी दुआ लीजिये .
दर असल गाँव में काम सम्हालने वाला कोई नहीं होने से भरी नुकसान  उठाना पड़ रहा है .
बड़ी जायदाद है बिजली का बिल मुफ्त में चुकाना पड़ रहा है .
आप चिंता छोडिये और मुझे चार साल के लिए सस्पेंड कीजिये .
यदि नाचीज़ को लायक समझे तो पांचवे वर्ष सवेतन बहाल कीजिये .
इसमें दोनों ही काम बन जायेंगे  मेरा  घर और नौकरी बनी रहेगी आपके फिर काम आयेंगे. 


Friday, December 3, 2010

पैसा जो हमारा है

स्विस बैंक के एक जिम्मेवार अधिकारी के मुताबिक भारत के नेताओं का २८० लाख करोड़  रुपया स्विस बैंक में जमा है . और अगार इतना रुपया हमारे देश में वापस आ जाये तो हमारे देश में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकते है जैसे इतने रुपयों से देश का बजट ३० वर्षो तक बिना किसी अतिरिक्त कर के पारित होगा ६० करोड़ भारतियों का नौकरी मिल सकती है ,सभी गावों से दिल्ली तक ४ लें सड़क का निर्माण हो जायेगा ५०० सामाजिक प्रतिष्ठानों को हमेशा   निशुल्क बिजली आपूर्ति की जा सकती है , और हर भारत वासी को ६० वर्षों तक २००० रूपये प्रति माह बांटा जा सकता है ! सोचिये हमारे अमीर  भ्रष्ट नेताओं ने देश का कितना पैसा देश के बाहर ब्लाक कर रखा है .... आओ हम सब मिलकर विचार करे यह पैसा जो हमारा है हमारे देश को वापिस कैसे मिल सकता है ....

Tuesday, September 21, 2010

क्यों राघव क्यों ?

क्यों राघव क्यों ?
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गए छोड़ सौमित्र विकट वन में सीता की तन्द्रा जागी !
यह कैसा निर्णय लिया राम ने खुद से पूंछ रही वह राज्ञी !
राम ! तुम राजा जन जन के मन के अनुरागी !
मैं प्रिय प्रिया  तुम्हारी फिर भी किंचित रही अभागी !
ओ मानस मर्यादा के नव सोपान बनाने बाले राम !
क्या तुम्हारा नारी चिंतन भी यूँ ही रहा मिसाले   आम. 
अवध पति ! तुम न्यायमूर्ति थे न्यायिक पद पर विद्यमान !
यह आक्षेप सहा तुमने क्या अग्नि परीक्षा से अंजान ?
वादी ने कहा सुना तुमने निर्णय भी आप ही दे डाला ?
 मुलजिम को सुने बिना ही राजन वनवास निकाला  !
मुलजिम को ना सुनने  की प्रजापति कुछ लाचारी थी ?
या वादी की प्रतिक्रिया स्वामी विश्वासों पर भारी थी ?
 चित्रकूट की कुटिया में साथ तुम्हारे सुख ही पाया !
और विछुड़ कर तुमसे अशोक वाटिका स्वर्णपुरी में दुःख ही पाया !
तब मजबूरी में सहा वियोग तुम मेरी खातिर भटके वन में !
ओ निष्कासित करने वाले! खो दी क्या? जो थी प्रीत तुम्हारे मन में !
मैं धरती की बिटिया शायद वनवास भाग्य लिखा लाई!
यह क्लेश ना मुझको किंचित तुम साक्षी हो रघुराई !
राम  राज्य में रानी भी जब घोर उपेक्षा की भोगी .
यही कष्ट है मुझे अवध में नारी की क्या गति होगी .

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रचना :-
अशोक सूर्यवेदी  एडवोकेट 
मऊरानीपुर 
  

Sunday, September 19, 2010

मऊरानीपुर जल विहार महोत्सव २०१०

                    जल विहार महोत्सव २०१०
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जल विहार मऊरानीपुर की ऐतिहासिक परंपरा है ! भाद्रपद माह  की द्वादस  तिथी को भगवान अपने श्री मंदिर से  ना केवल सुखनई  के जल में विहार करने वरन भक्तों को दर्शन देने के लिए बाहर निकलते हैं ! ऐसा प्रसिद्द है कि जब भगवान मूर्ति स्वरुप में  एक बार मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाते  है तो फिर बाहर नहीं निकलते हैं ! किन्तु लोक कल्याण के लिए अपने हर  खास और आम भक्त को दर्श-पर्श देने भगवान इस नगर में ना केवल अपने श्री मंदिर से बाहर निकलते हैं बल्कि सुखनई के जल में विहार कर भक्तों के दरवाजे दरवाजे जाकर उनकी कुशल क्षेम भी लेते हैं ! मऊरानीपुर में जल विहार का विशेष महत्व इसलिए भी है कि जब ब्रिटिश काल में इस परम्परा को रोकने की धर्म विरोधी कोशिश की  गयी तो नगर के प्रातः स्मरणीय  गूदर बादशाह जी भगवान की  अगवाई में अंग्रेजी आदेश की  अवहेलना कर परम्परा को जारी  रखा गया  इसलिए आज भी जलविहार के प्रथम दिन भगवान गूदर बादशाह जी महाराज का विमान शोभायात्रा की अगुवाई  करता है  !जल विहार के लिए भगवान गूदर बादशाह जी महाराज के अतिरिक्त भगवान  धनुषधारी जी महाराज , रामलला भगवान जानकी जी और लखन लाल जी सहित अनेकानेक विमानों में शोभायमान होकर पवित्र सुख नई के जल में विहार कर नगर भ्रमण कर वापिस अपने मंदिरों में आते हैं .

Saturday, July 17, 2010

अपना हाथ जगन्नाथ

 अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तर:
 अयं मे विश्वभेषजो अयं शिवाभिमर्शन: 


ऋग्वेद की इस पवित्र ऋचा का अर्थ है की मेरा यह हाथ ऐश्वर्यवान भगवान्  है  यह मेरा दूसरा हाथ और भी ऐश्वर्यवान है। यह मेरा हाथ सभी रोग-व्याधियों को औषधि के समान दूर करने वाला है। अर्थात ये मेरे दोनों हाथ जीवन के सभी दुख-दैन्य दूर कर सकते हैं। ये मेरे हाथ सुखद स्पर्श वाले हैं, यानी सुखदायी हैं .


इसी प्रकार एक अन्य श्लोक :-


कराग्रे बसते लक्ष्मिः , कर मध्ये सरस्वती,
करमूले तु गोविन्दः , प्रभाते  करदर्शनम,


अर्थार्त   हाथ के अग्रिम भाग में माता लक्ष्मी मध्य में सरस्वती और जड़ के स्थान पर स्वम भगवान् गोविन्द का निवास है इसलिए प्रभात  काल में अपने हाथ का दर्शन करना चाहिए !

दोनों ही हाथ में भगवान की उपस्थिति का वर्णन करते है और वैसे भी हाथ ही हमारे अधिकतर कार्यो का संपादन करते है इसीलिए कहा जाता है अपना हाथ जगन्नाथ !




अशोक सूर्यवेदी