Friday, September 11, 2015

खङ्ग और यौद्धेय खंगार


पुराण और महाभारत के अनुसार पहले केवल सागर था। न
उत्ताल तरंगें थीं, न जलचर थे। निविड़ अंधकार था। पृथ्वी
नहीं थी। ब्रह्मा ने सृष्टि रची। पृथ्वी, नक्षत्र , वनस्पति,
पर्वत, नदियाँ, मनुष्य, पशु-पक्षी, देव-दानव रचे। दानव
और राक्षस उत्पाती थे, लूटमार करते थे। शोर करते थे।
किसी को शान्ति से जीने नहीं देते थे। ब्रह्मा ने यज्ञ
किया। समिधाओं में अग्निदेव प्रज्वलित हुए। नीलवर्ण
के भयंकर भूत का अभिर्भाव हुआ। उसका नाम 'असि'
था। उसने भयंकर रूप त्यागा और लौह में प्रतिष्ठित हुआ।
तीन अंगुल चौड़ा, दो-तीन हाथ लम्बे तीखे खड्ग के रूप में
प्रतिभासित हुआ। उसके उदभव से पृथ्वी और भी अशान्त
हो गई, ब्रह्मा ने उसे लोक रक्षा के लिए बनाया था।
शिव ने उसे ग्रहण किया। एक दूसरा चतुर्भुज रूप धारण
किया, जो विकराल तीन नेत्रों से युक्त था। खड्ग ले
शिव ने दैत्यों का संहार किया। रक्तरंजित खड्ग विष्णु
को समर्पित कर दी गई। दैत्यों के विनाश से देवता
प्रसन्न हुए। यह खड्ग विष्णु से लोकपालों, मनु,
मनुसन्तानों के पास होती हुई महाभारत के वीर
योद्धाओं के पास पहुँची। तदन्तर यौद्धेयों के जिस आयुधजीवी
गण ने खंग को अस्त्र रूप में अपनी जीविका का साधन बनाकर
स्वीकार किया वो कुल खङ्गधार अर्थात् खंगार कहलाया
.......!!

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