Saturday, March 27, 2010

SAHODRA RAI KHANGAR

                               सहोदरा राय खंगार


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बुंदेलखंड वीर प्रसूती भूमि है, यहां न केवल पुरुष अपितु महिलाओं ने भी देशभक्ति के लिये जिस साहस, बलिदान और त्याग का परिचय दिया है वह अद्वितीय है। 1857 के आजादी के महासमर की नायिका झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने त्याग और साहस की जो ज्योति जलाई उसे कर्रापुर (सागर) की सहोदरा राय ने 1957 के गोवा मुक्ति आंदोलन में भी प्रज्जवलित रखा और स्वतंत्रता के इतिहास में अपने साहस का एक नया पृष्ठ जोड़ा। गोवा मुक्ति आंदोलन के समय गोवा में राष्ट्रीय तिरंगा ध्वज फहराते समय पुर्तगाली सैनिकों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी, पर सहोदरा राय ने अभूतपूर्व साहस का परिचय देते हुए अपने प्राणों की परवाह न करते हुए गोवा में पुर्तगाली झंडा उतारकर राष्ट्रीय तिरंगा फहरा ही दिया। यद्यपि वे इस गोलाबारी में काफी घायल हो गईं, किन्तु उनके प्राण ईश-कृपा से बच गए। सहोदरा राय के इस साहस की प्रशंसा तत्कालीन प्रधानमंत्री तथा नये भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू ने की थी।



राय खंगार परिवार में जन्मीं सहोदरा राय बचपन से ही साहसी और खतरों से भरे खेल खेलने में माहिर थीं। वे अपने अधिक से अधिक दोस्त और सहेलिया बनाने में भी माहिर थीं। पुराने लोग बताते हैं कि जब उनके गांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भाषण करने आते या कि कोई धरना प्रदर्शन करते तो सहोदरा राय की बाल मंडली सबसे आगे रहती - ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार इलाहाबाद में बचपन में इंदिराजी की वानर सेना आगे रहती थी।



किशोरावस्था में पहुँचने के साथ ही सहोदरा जी का कार्य क्षेत्र का विस्तार हो गया। वे सागर सरस्वती वाचनालय में जो कि आजादी के संघर्ष के दौरान कांग्रेस का जिला मुख्यालय था, जहां से आजादी के संघर्ष की योजनाएं और कार्यक्रम बनते थे, में आने जाने लगी। उन दिनों सागर के कांग्रेसी स्तम्भ स्वामी कृष्णानंद एवं गौरीशंकर पाठक के सम्पर्क में आई। इन दोनों के प्रोत्साहन और मार्गदर्शन से सहोदरा राय ने शीघ्र ही सागर जिले की आजादी की लड़ाई में अपना विशेष महत्वपूर्ण स्थान बना लिया तथा गांव-गांव में लोकप्रिय हो गईं। लोग उन्हें आदर से सहोदरा मौसी के संबोधन से पुकारने लगे।



पिछली सदी के पांचवें दशक में सहोदरा जी ने इतनी लोकप्रियता अर्जित कर ली थी कि उनके बिना सागर में कोई भी जुलूस या प्रदर्शन नहीं होता था। पुरुषों में स्वामी कृष्णानंद, ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी, भाई अब्दुल गनी, गौरीशंकर पाठक आदि प्रमुख जनाधार वाले नेता थे तथा महिलाओं में सहोदरा राय, शांता पाठक जैसी नेत्री थीं, जिनका जनाधार काफी विस्तृत और प्रभावपूर्ण था। सहोदराजी की एक आवाज पर तीन बत्ती के पास सरस्वती वाचनालय के नीचे सैकड़ों महिलाओं की भीड़ इकट्ठी हो जाती थी।



सहोदराजी का व्यवहार और बोलचाल बड़ा मधुर और आत्मीयता पूर्ण था। कायरे का मोखों भूल गयो जैसे आत्मीयतापूर्ण संबोधनों का वे अक्सर प्रयोग करती थीं। गजट (सागर में अखबार को गजट कहा जाता है) वालों से भी उनके ताल्लुकात बड़े मधुर रहे। यही कारण रहा कि उन्हें न केवल सागर के स्थानीय साप्ताहिक पत्रों सिपाही, विंध्यकेसरी, देहाती दुनिया, कर्तव्यदान आदि में ही नहीं अपितु जबलपुर, इलाहाबाद, दिल्ली से आने वाले पत्रों जयहिन्द, अमृत पत्रिका, नवभारत टाईम्स आदि से भी अच्छा कव्हरेज मिला। उन दिनों मदन तोमर, महेश दुबे आदि नवोदित पत्रकार तो मौसी को चपलता दिखाकर मूंगफली, पट्टी खाने के लिये रुपया, आठ आने झटक लेते थे। मौसी उन नवयुवकों को प्यार से धौल जमा देती थीं।



सरस्वती वाचनालय की अटारी उनके रात्रि विश्राम का प्रमुख स्थान था। जब भी वे सागर में रहती यहीं रुकती थीं। उनकी सारी राजनैतिक गतिविधियां यहीं से संचालित होती थीं। लोगों से यहीं मिलतीं और यहीं से उनकी समस्यायें सुनकर उनके निराकरण के लिए डी.सी. (कलेक्टर), पुलिस कप्तान (एस.पी.) से मिलने चली जातीं।



गोवा की घटना के बाद नेहरू जी द्वारा तारीफ किये जाने से इन्हें कांग्रेस ने सागर से सांसद का टिकिट दे दिया और वे भारी बहुमत से जीत कर सांसद बनीं । यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण था कि गांव की एक महिला पूरे क्षेत्र में अपने कामों द्वारा कितनी पसंद की जाती है।

सांसद बनने के बाद मौसी के कार्यव्यवहार में कोई फर्क नहीं आया। वही मीठी बुन्देली बोली और क्षेत्र के विकास के लिये सिंचाई, बांध, सड़क, खेतिहर मजदूरों की समस्यायें, आत्मीयता के लहजे में मंत्रियों और अधिकारियों से सहृदयतापूर्वक निवेदन करतीं तथा काम पूरा कराके ही छोड़ती थीं। दूसरे राजनेताओं की तरह उन्होंने कभी भी विशेष लाभ लेने की कोशिश नहीं की और ना ही लेडिज फर्स्ट के सिध्दांत पर अड़ीं। उनके इसी व्यवहार से उच्च पदाधिकारी प्रसन्न रहते थे तथा मौसी द्वारा बताया काम कहीं अटकता नहीं था ।



मौसी में एक और गुण था जो दूसरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों में दुर्लभ होता है, वह है व्यक्तिगत लाभ लालच से दूर तथा जो काम न हो सके उसे साफगोई और शालीनता पहले ही मना कर देना। झूठे या गलत आश्वासन देना उनकी प्रवृति में नहीं था। अगर मौसी ने किसी काम के लिये हाँ कह दिया तो उसे पूरा कराने में अपनी पूरी शक्ति लगा देती थीं। मौसी का रहन-सहन और खानपान बहुत ही सादा था, जिसने जो खिला दिया प्रेम से खा लिया।



छठवें दशक से जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में जो दिखावटीपन, झूठे आश्वासन तथा निजी लोभ लालच की प्रवृत्ति बढ़ना शुरू हुई, उसे देखकर वे अक्सर दुखी हो जाती थीं। कहा करती थीं कि काय हमने एई के लाने गोरों के डंडे खाये हते। जै काले तो लूटपाट में गोरों के बाप बने जा रहे हैं।

सहोदरा राय का राजनैतिक काल सिध्दांतों और नैतिकता को सर्वोपरि मानने वाला था। जिसकी आज के प्रदूषित होते जा रहे राजनैतिक वातावरण में बड़ी जरूरत है।

Friday, March 26, 2010

MAHARAJA KHET SINGH KHANGAR

राष्ट्र धर्म और जुझारू संस्कृति के जनक
महाराजा खेत सिंह खंगार
                                                          अशोक सूर्यवेदी
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वीर प्रसूता पावन भू पर , वीर खंगारों सी संतान !
सदियों का इतिहास बताता ,खंगार वीर थे बड़े महान !
खंग अंग जो धारण करते कहलाते थे वो खंगार !
 इसी जुझौति में जन्मे थे एक राजन ऐसे खेत खंगार !
शेरों से बिन शस्त्र वो लड़ते बज्र देह वाले थे खेत !
खड्ग धार जब रण में डटते बैरी नवते सैन्य समेत !
बैशाख मास अक्षय तृतीया तिथी पुनीता !
खेतसिंह ने गण परिषद् का बहुमत जीता !
धसान बेतवा यमुना के जल से पावन अभिषेक हुआ !
विंध्याचल मुदित मन भारी उत्सव यह देख हुआ !
सिंहासन पर बैठा नायक चंदेलों का दिल धक् धक् धड़का !
आततायी यवनों का भी रक्त धमनियों में छनका !
आशा टूटी पड़िहारों की गोंडों के सपने टूट गए !
क्रूर अधर्मियों के अल्ला भी उनसे रूठ गए !
दिल्ली पर शासन करते थे राजन प्रथ्वीराज महान !
मित्र बनाया खेत सिंह को बड़ी दिनोदिन उनकी शान !
विजय महोबा किया खेत सिंह उदल ना सह पाया वार !
आल्हा और परमाल से योद्धा रण से छोड़ भागे संग्राम !
खंगार वीर का लौह मना दिल्ली पति ने महोबे माह  !
विजय तिलक कर खेत सिंह का दिल्ली शासन की दी छांह !
आतंक तभी गौणों का सीमा लाँघ गया सिर होकर पार !
चैन की साँसे दी जनता को गोणों का कर के संहार !
प्रथ्वी राज मुदित मन भरी खेत सिंह की जय जयकार !
जूझ के जीने मरने वालों का ही  धाम बना है गढ़ कुंडार !
तभी तराइन की भूमि पर गौरी ने दे दी ललकार !
क्षमा दान पा गीदड़ ने फिर सिंहों पर कर दीन्हा वार !
रणसींगा बज उठा युद्ध का भूमि तराइन में ललकार !
हिंदी हिन्दू हिंद के रक्षक कूंद पड़े रण ले तलवार !
हुआ युद्ध तब महा भयंकर बिजली सी चमकी तलवार !
लावा फूट पड़ा आँखों का बनकर लोहू पी असिधार !
हा पत्नातुर हुआ बिधाता सर्व खर्व का दाता आज !
वीर प्रश्वनी भू पर टूटी गद्दारी की भरकम गाज !
प्रथ्वीराज छले गए रणमें हतप्रभ राह गया वीर समाज !
हाय तराइन चींख पड़ी साँपों से कैसे बंध गया बाज !
लेकिन जाने से पहले वो करतब दिखा गए चौहान !
बिन आँखों के तीर चलाकर मार गिराया था सुल्तान !
क्षात्र धर्म को किया कलंकित जयचन्द्र ने बनकर गद्दार !
अपने घर में आग लगाकर कौन बना है सूबेदार !
गद्दार के संग गद्दारी कर दी पीठ में घौंपी थी तलवार !
घर के भीतर फूट हुयी तो बनी मुसल्लों की सरकार !
त्राहिमाम कर उठा सनातन देख मुसल्ला अत्याचर !
स्वर्ण सुंदरी के लोभी वे मर्यादा पर करते वार !
मित्र सखा संरक्षक छीना अनहोनी ने कर प्रहार !
ना हुए निराश खेत सिंह जी करते रहे वार पर वार !
दिल्लीपति का शोक मना ले इतना समय नहीं था पास !
क़तर द्रष्टि देख रही थी उनकी और सभी की आस !
राष्ट्र धर्म सर्वोच्च मानकर हिन्दू शासन दिया करार !
खंड जुझौती राज्य बनाया जन जन को सौंपी तलवार !
एक जुझारू नीति बनाकर रक्कस का कर दिया प्रसार !
सीमा को निज पुत्र सौंप कर शिशु को रक्षक दिया करार !
नारी राष्ट्र  ध्वजा भारत की निर्बल हमें नहीं स्वीकार !
वीर प्रश्वनी माताएं भी शस्त्र करें अब अंगीकार !
खड्ग थमा दी पुरुषों को देकर सीमा का अधिभार !
और खंगोरिया महिलाओं को  दुर्गा शक्ति का अवतार !
सामंत मित्र और सैन्य मिलकर संघ बनाया तब खंगार !
जुझौती खंड हित जूझा है जो खंग आरोति वह खंगार !
राष्ट्र धर्म के हित चिंतन को संघ बनाया था खंगार !
वेत्रवती से चम्बल तक फैली वीर खंगारों की सरकार !
धर्म प्रिय थे रा खेत सिंह किया धर्म का बहुत प्रसार !
मां गजानन शक्तिपीठ मंदिर बनवाया गढ़ कुंडार !
स्वाभिमान और देश की खातिर खंग अंग जो करते धार !
विजय सदा उनकी ही चेरी जो दुश्मन पर करते वार !
सदा समर में जीती शक्ति नहीं सुहाए हैं मनुहार !
यदि समर से मुह मोड़े तो उस शासन को है धिक्कार !
राष्ट्र धर्म और क्षात्र धर्म का पाठ पढ़ा गए हैं महाराज !
विजय पराजय ना लख जुझौ यही सिखा गए  हैं महाराज ! 
जब तक नीर बहे बेतवा साक्षी जब तक गढ़ कुंडार !
वीर ! दिवाकर गाथा गए यूँ ही तेरी जय जय  खंगार !!!!
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जय सौराष्ट्र --- जय गिरनार !!!
जय जुझौती----- जय कुंडार!!!

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कृति
अशोक सूर्यवेदी एड. 
मऊरानीपुर ( झाँसी )  




Thursday, March 25, 2010


खंगार घनाक्षरी छंद 
अशोक सूर्यवेदी 
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(१)
हैं  खंगधारी खंगार छोड़ आये तलवार ,
माता कालिके ने मांसी संग भिजवाया है !
खंग शास्त्र वाले हस्त सौंप दिया मसि पत्र,
रक्त हस्त देखिएगा लेखनी थमाया है !
साधना में शारदे की सधे हों जो वीर किन्तु '
स्वाभिमान पे दें जान ये भी सिखलाया है !
देश जाति धर्म पै जो डाले नीच हाँथ कोई ,
काट लेना शीश वीर ये भी समझाया है !!
(२)
शेरों सा है शेर वंश वीरों में है वीर वंश ,
महारुद्र अंश खंगार को नमन है !
नारी की सुरक्षा हित वीरों की परीक्षा हित ,
चमकी जो सदा असिधार को नमन है !
केशर ने जौहर किया मानी स्वाभिमानी थी ,
भस्मी भूत देह अंगार को नमन है !
जूझना परम्परा है जुझौती वसुंधरा है ,
वीरों का है धाम कुंडार को नमन है !
(३)
काशी जैसी  पुन्य भूमि , वीरों की वो वीर भूमि ,
चोरों का है गढ़ हमें ये ना बतलाइए !
राष्ट्र हित धर्म हित उठाया था खड्ग नित ,
गाथा खंगारों की छुपी पर्दा हटाइए !
भारती के पूतो गिरवासनी पुकारती है ,
खेत सिंह जैसे सिंह को ना बिसराइये  !
बुंदेलों का कहा सुना सत्य से है परे सदा ,
अंधी कानी दौड़ में ना कलम लजाइए !
(4 )
कालिंजर कुंडार महोबे पै फहराती जो ,
कीर्ति ध्वजा खंगधारिओं ने फहराई है !
खजुरिया वो खजुराहो कर रहा गुणगान ,
खेत सिंह हैं महान युग नारी हरषाई है !
नंगी भोग्य जो बस्तु बनी थी बाजार की ,
खेत सिंह राज्य पूज्य ध्वजा बनी छाई है !
हुए जन बिह्वल गायें सब करतल ,
हमें तो सत्ता श्रेष्ठ खंगारों की ही आई है !
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