Sunday, December 27, 2015

Krantikari

Khangar , Lodhi .Goojar, Bhar, Khatik, Pasi, were notified  as born crminals in the British Raj under Criminal Tribes Act, 1871. While infact these communities were krantikaari but not criminals. This notorious Act, first was implemented in north India. Though India got freedom in 1947 but these so called Criminals could not get freedom. The Criminal Tribe Act was repealed on 31 August 1952. Thus these krantikaari community were free after 5 years of independence. But stigma of criminality is still adhered on there forehead because State governments are not issuing Vimukt jaati certificates to them ( after repeal of criminal Tribe Act 1871, these communities were declared as Denotified Tribe or Vimukt Jaati). Police administration as well as civilians too assumed them Born Criminals. In the independent India, the ancestors of krantikaari are not free from stigma criminality.

Friday, December 18, 2015

मऊरानीपुर

मऊरानीपुर ................एक अद्भुद
बस्ती है . स्थापत्य की दृष्टि से यह
अयोध्या की बराबरी करती है
इसीलिए
मिनी अयोध्या कहलाती है..... ...सरयू
जी की तरह इस बस्ती में सुखनई
प्रवाहित होती है ......... जिसके
तीरों पर भव्य मंदिर हैं
जहाँ की शोभा अतुलनीय है .....
यहाँ धनुषधारी भगवान् श्री राम भी हैं
और सुदर्शन धारी भगवान् श्री कृष्ण
भी हैं ........... माता के शक्ति पीठ हैं
तो महादेव के मंदिर भी हैं .....
बस्ती की सुरक्षा में हनुमत लाल
की चहुदिस चौकस चौकी है .....यहाँ के
जलविहार अपनी एक विशिष्ठ पहचान
रखते हैं .......... ब्रिटिश हुकूमत
को चुनौती देने वाले भगवान् गूदर
बादशाह ......... और अपनी कलाओं के
लिए लोक में विख्यात नवल दउआ
भगवान् लठाटोर जी जलविहार
की शान हैं जिनके दर्शन
को सारा प्रदेश उमड़ पड़ता है .......यह
बस्ती साहित्यिक रूप से भी बहुत
सम्रद्ध है कहा जाता है कि सुखनाई के
पानी में साहित्य है .............
अपनी इन्ही विशिष्ठताओं को संजोय
मऊरानीपुर उत्तर भारत की एक प्रमुख
बस्ती है यहाँ महुआ के
पेड़ों की अधिकता है शायद इसीलिए
इस बस्ती का नाम मऊरानीपुर हुआ
है........ दस्तावेजी जानकारी से इस
बस्ती को राजा मधुकर शाह ने
बसाया था इसीलिए इसका नाम
मधुपुरी भी रहा है ..... इस बस्ती में
प्रसासनिक व्यवस्था के लिए
"भोजराज खंगार" को कोतवाल
नियुक्त किया था था .......इसलिए यह
बस्ती भोज की मधुपुरी नाम से
जानी गयी ......कालांतर में लोगो ने
कोतवाल भोजराज को "राजा भोज"
मान लिया ........ और यह प्रचालन में
आ गया कि यह शहर राजा भोज के
द्वारा बसाया गया ............
कथा चाहे कुछ भी हो ........पर यह
शहर , शहर की सुखनई , शहर के मंदिर ,
शहर की परंपरा , शहर के लोग , शहर
का साहित्य सब कुछ अतुलनीय
है .........वन्दनीय है अभिनंदनीय
है .........

Saturday, September 12, 2015

मुक्ति दिवस 2015 गढ़कुण्डार

खंगार विमुक्त जाति मोर्चा के तत्वाधान में आयोजित मुक्ति दिवस समारोह 31 अगस्त 2015 की स्मृतियाँ

Friday, September 11, 2015

खङ्ग और यौद्धेय खंगार


पुराण और महाभारत के अनुसार पहले केवल सागर था। न
उत्ताल तरंगें थीं, न जलचर थे। निविड़ अंधकार था। पृथ्वी
नहीं थी। ब्रह्मा ने सृष्टि रची। पृथ्वी, नक्षत्र , वनस्पति,
पर्वत, नदियाँ, मनुष्य, पशु-पक्षी, देव-दानव रचे। दानव
और राक्षस उत्पाती थे, लूटमार करते थे। शोर करते थे।
किसी को शान्ति से जीने नहीं देते थे। ब्रह्मा ने यज्ञ
किया। समिधाओं में अग्निदेव प्रज्वलित हुए। नीलवर्ण
के भयंकर भूत का अभिर्भाव हुआ। उसका नाम 'असि'
था। उसने भयंकर रूप त्यागा और लौह में प्रतिष्ठित हुआ।
तीन अंगुल चौड़ा, दो-तीन हाथ लम्बे तीखे खड्ग के रूप में
प्रतिभासित हुआ। उसके उदभव से पृथ्वी और भी अशान्त
हो गई, ब्रह्मा ने उसे लोक रक्षा के लिए बनाया था।
शिव ने उसे ग्रहण किया। एक दूसरा चतुर्भुज रूप धारण
किया, जो विकराल तीन नेत्रों से युक्त था। खड्ग ले
शिव ने दैत्यों का संहार किया। रक्तरंजित खड्ग विष्णु
को समर्पित कर दी गई। दैत्यों के विनाश से देवता
प्रसन्न हुए। यह खड्ग विष्णु से लोकपालों, मनु,
मनुसन्तानों के पास होती हुई महाभारत के वीर
योद्धाओं के पास पहुँची। तदन्तर यौद्धेयों के जिस आयुधजीवी
गण ने खंग को अस्त्र रूप में अपनी जीविका का साधन बनाकर
स्वीकार किया वो कुल खङ्गधार अर्थात् खंगार कहलाया
.......!!

मुक्ति दिवस 2015 गढ़कुण्डार

31 अगस्त 2015 को मुक्ति दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में अशोक सूर्यवेदी का विमुक्त सम्बोधन

मुक्ति दिवस 2015 गढ़कुण्डार

31 अगस्त 2015 को मुक्ति दिवस पर ध्वजारोहण करते विमुक्त खंगार युवा

Saturday, June 6, 2015

समुद्रवीर और कूप मंडूक

समुद्र कुल का वंशज धरातल पर भ्रमण को निकला , चलते चलते उसको एक कुआँ मिला उसने झाँककर देखा तो उसमे जल दिखा और कुछ कोलाहल भी सुनाई दिया ! कौतूहलवश वह कुऐं में उतर गया कुऐं में उसकी मुलाकात एक उत्साही मेंढक से हुई , मेंढक ने समुद्र कुल वंशज से पूँछा तुम लगते तो हमारी ही जलचर समाज को हो , कहो कहाँ से आये हो ? समुद्र वीर ने जबाब दिया मैं समुद्र का हूँ ! कुऐं के मेंढक ने अचरज से पूँछा ये समुद्र कैसा होता है ? समुद्रवीर ने जबाब दिया समुद्र बहुत बड़ा होता है समुद्र पृथ्वी के तीन चौथाई भाग में फैला है ! उत्साही कुऐं के मेंढक ने कहा अच्छा और एक छलांग लागई फिर पूँछा क्या इतना बड़ा है तुम्हारा समुद्र ? समुद्रवीर ने प्यार से जबाब दिया नही भाई समुद्र बहुत बड़ा होता है समुद्र सम्पूर्ण पृथ्वी के तीन चौथाई क्षेत्र में व्याप्त है ! कुऐं के मेंढक ने फिर एक लम्बी छलांग मारी और कहा निश्चित रूप से तुम्हारा समुद्र इतना बड़ा होगा ! समुद्रवीर ने समझाया देखो भाई पृथ्वी बहुत बड़ी है पृथ्वी के तीन चौथाई भाग में समुद्र है ये तुम्हारी छलांग से नापने की विषय वस्तु नही है ! कुऐं के मेंढक ने कहा देखो जी अज्ञानी तुम्हारी पृथ्वी और पृथ्वी का समुद्र दुनिया से बड़ा नही हो सकता और मैं पूरी दुनियां दिन भर में कई बार नाप लेता हूँ  समुद्रवीर ने पूँछा कहाँ है भाई आपकी दुनियाँ उत्साही मेंढक ने कुऐं की परिधि पर उचक उचक कर जबाब दिया ये रही दुनियां इससे आगे कुछ नही है ऊपर नीला आकाश और नीचे हमारी दुनियाँ जहाँ हम उछल कूंद करते हैं ! समुद्रवीर कूप मंडूक की जड़ता पर मुस्कराया और उसके मंगल की कामना कर कुऐं से बाहर निकल कर आगे बढ़ गया .....!!

Sunday, May 31, 2015

काला कानून और खंगार

स्वतंत्रता की रक्षा में सनद्ध स्वतंत्रता प्रेमी जातियों के उन्मूलन के लिए जब ब्रिटिश सरकार ने सन् 1871 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट नाम का काला कानून पारित किया तब बहुत सी स्वतंत्रता प्रेमी जातियाँ जो इस काले कानून की जद में आई नाना प्रकार से उत्पीड़ित की गयी इस काले कानून में स्वतंत्रता प्रेमी जातियों के महिला बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी कोई रियायत नही थी इस एक्ट को पास कराने वाले सांसद मिस्टर स्टीफन थे। उन्होंने कहा था कि डॉक्टर के यहां
डॉक्टर, वकील के यहां वकील पैदा होते हैं और चोर के यहां चोर, गुनेहगार के यहां गुनेहगार और डाकू के यहां डाकू पैदा होते हैं।
इसका मतलब यह है कि जो बच्चा इन वर्गों में जन्म लेता है, वह जन्म लेते ही अपराधी और गुनेहगार कहलाता था। इस काले कानून में ऐसे प्रावधान थे कि इन समुदायों को कहीं घूमने-फिरने
की भी इजाजत नहीं थी। सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस यदि एक बार इन्हें सजा सुना देता था, तो वही आखिरी फैसला माना जाता था। इन्हें कोर्ट में जाने का कोई अधिकार नहीं था। यह एक अमानवीय कानून था। यदि इन्हें एक गांव से दूसरे गांव जाना होता था, तो
जिस गांव में ये जाते थे, उस गांव में जो पुलिस पोस्ट होती थी, उसके पास इन्हें अपना नाम दर्ज कराना पड़ता था। इतना ही नहीं, इनके माथे पर, एक लोहे के सिक्के को खूब गर्म कर के, उसकी मोहर लगाई जाती थी, ताकि इनकी पहचान हो सके कि ये क्रिमिनल कास्ट से आए हैं। इन लोगों के साथ इतना घोर अन्याय ब्रिटिश लोगों ने किया कि इंसानियत की रूह काँप गयी ! खंगार , लोधी , चढ़ार, जोगी , लोहगढ़िया और कबूतरा सहित बुंदेलखंड की और समग्र भारत की 160 जातियाँ अपने अपने अस्तित्व की रक्षार्थ बेचैन हो उठी ! खंगार यौद्धेय रक्त था आयुधजीवी वृत्ति थी उनकी उनके पास जंगल में उतरने के सिवाय कोई चारा न था बहुतेरे खंगार परिवार अंग्रेजों की गोलियों की भेंट चढ़े और बहुतेरे परिवार जंगलों में गुमनामी जीवन जीने को विवश हुए खंगारों की जागीरें और जमीनें छीन ली गयी कुछ एक परिवारों ने ब्रिटिश हुकूमत की मातहती स्वीकार कर ली और ग्राम कोटवार या चौकीदार का पद सम्हाल कर अपने परिवार की रक्षा की जब 1919 में ब्रिटिश हुकूमत के अधीन भारत की जनगणना की गयी तब क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट से घबराये लोगों ने अपनी जाति ही बदल डाली और खुद का परिचय दूसरी जाति से बता दिया कइएक आतंकित खंगार जनों ने भी अपने को "परिहार" बताया ! कालांतर में खंगार आश्रित चारण और भाटों ने उनको परिहार वंशी घोषित करने की कुचेष्टा की और अपनी पोथियों में संशोधन करते हुए उन्हें परिहार वंश में स्थापित करने की कोशिश की और खंगारों के गौरवशाली इतिहास की पूरी पूरी उपेक्षा कर डाली इसी समय गुजरात के सोरठ कच्छ और भुज का इतिहास कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी जी के कर कमलों द्वारा प्रकाशित हुआ और भाटों ने सोरठ कच्छ और भुज के खेंगार/खंगार नामधारी राजाओं से खंगार जाति का सम्बन्ध बता डाला जो कि पूर्णतयः अमान्य है भाट पोथियाँ और उनका अनुशरण करने वाले लेखक जूनागढ़ सौराष्ट्र के शासकों को और कभी कभी कच्छ के शासकों को परिहार बताकर  उनकी 12 शाखाएं गिनाते हुए एक शाखा में कल्पित खेंगेराव (जो कि खेंगार जी हैं) के नाम से खंगार शाखा के विस्तार की बात कह देते हैं इन कल्पित कथाओं की वास्तविकता परखने के लिए खंगार जाति के प्रथम संगठनकर्ता श्रद्धेय श्री ओमप्रकाश जी ठाकुर "अनूप" ने कच्छ के राजपरिवार को पत्र लिखकर जूनागढ़ और कच्छ के राजघराने से खंगार जाति से सम्बन्ध की बाबत प्रश्न किया जिसका उत्तर देते हुए कच्छ के महाराज साहेब के प्रिवी पर्स अधिकारी श्री गोडजी आर जड़ेजा ने लिखा कि "हमारे यहाँ के इतिहास में ऐसा कोई आलेख नही है सिर्फ कोई कोई पीढ़ी पर युवराज जी का नाम ही खेंगारजी रहा है पर उनके नाम से कोई जाति की संज्ञा नही चली और यहाँ पर कोई खेंगार/ खंगार  जाति का बना हुआ समाज नही है"
यहाँ एक बात और भी स्पष्ट करनी है कि कच्छ का शासक  जडेजा राजकुल है जो सिंध के सामा शासकों की प्रशाखा है इनको परिहार कहा जाना सर्वथा अनुचित है और अप्रमाणिक है इसी प्रकार सोरठ का शासक राजकुल भी सिंध के सामाओं का वंश है जो खुद को सामावंशी कहते हैं उनका भी परिहारों से कहीं कोई सम्बन्ध नही है ! यह सब कहने का मेरा उद्देश्य मात्र इतना सा है कि कपोल कल्पित इतिहास के मायाजाल से बाहर निकलो और अपने पूर्वजों के गौरव को याद रखते हुए प्रगति के पथ पर आगे बढ़ो .........इति शुभम्........!!
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*बकलम*
"अशोक सूर्यवेदी एडवोकेट"
मऊरानीपुर झाँसी (उ.प्र.)
मो.9450040227

Sunday, May 17, 2015

" चलो दीपक जलाता हूँ "

अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!

अमा ने आज ठाना है ,
रोशनी होने न देगी !
होगा नही उजाला अब ,
धरा अम्बर को तरसेगी !

तिमिर से मैं मगर फिर भी , सदा विपरीत जाता हूँ !
अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!

मेघों ने कहा हुंकार ,
कर ले दासता स्वीकार !
चाँद तारे सभी तेरे ,
छुपे देखो मुझसे हार !

मगर निष्ठां मेरी ज्योति , उसे ही आजमाता हूँ !
अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!

अँधेरे का देखो राज ,
मूक है सारा विज्ञ समाज !
सक्षम जो करते प्रतिरोध ,
नदारद उसको दे ताज !

मेरी हस्ती है छोटी सी तो खुद को ज्वाल बनाता हूँ , अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!

प्रलय का दम घटा भरती ,
सहमती काँपती धरती !
तिमिर के राज में कुछ भी ,
रहेगा शेष कहीं नहीं !

प्रलय से मैं नही डरता , सृजन के गीत गाता हूँ !
अँधेरा है मगर फिर भी , चलो दीपक जलाता हूँ !!
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ब कलम
अशोक सूर्यवेदी एड.
मऊरानीपुर

Friday, May 15, 2015

घार

: "घार" :

पर्वत श्रेष्ठ "बाबा विंध्य" के प्राकृतिक संरक्षण में बसे भूभाग जिसे कि आज बुन्देलखण्ड कहा जाने लगा है  के इतिहास  पर कलम चलाने वाले कलमकारों ने "घार" शब्द की और उससे आशयित भूभाग की घोर उपेक्षा की या फिर यह शब्द और इसका यथार्थ उनकी दृष्टि से बचा रहा है !
"घार" शब्द खंगारो के सन्दर्भ में अत्याधिक महत्त्व रखता है ! यह शब्द आज भी स्थानीय खंगारों में एवं अन्य जातियों में अत्याधिक गौरव के साथ प्रयुक्त होता है ! घार शब्द समूह अथवा गण का घोतक है जो निश्चित रूप से खंगार शासित भूमि को खंगार गणराज्य होने की स्पष्ट घोषणा करता है ! "घार" शब्द खंगारों के राजनैतिक , भौगोलिक , एवं सांस्कृतिक इतिहास पर न केवल पर्याप्त शोध की रूपरेखा प्रस्तुत करता है बल्कि अँधेरे में छिपे उनके स्वर्णिम अतीत पर प्रकाश डालने की अद्भुद क्षमता भी रखता है !
घार शब्द बुंदेलखंड की पयस्वनी सरिताओं दशार्ण (धसान)एवं वेत्रवती (बेतवा) के मध्य के भूभाग को सीमांकित करता है ! यही वह भूभाग है जहाँ प्राचीन गणतंत्र के पालक पोषक यौधेयों के आयुधजीवी गण खंगार का मुख्य क्रीड़ांगन है जहाँ उन्होंने अपना वर्चस्व स्थापित किया और यहीं पर अपना सर्वस्व निछावर  किया ! आज भी खंगार आबादी के प्रमुख ग्राम और की गणसत्ता का केंद्र गढ़कुण्डार इसी बेतवा और धसान के मध्य स्थापित हैं !

*"घार के पार खंगार"*

यौद्धेय खंगार घार में स्थापित हुए किन्तु वे यहीं तक सीमित न रह सके और कालान्तर में उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं को विस्तार दिया धसान के पार जाकर केन नदी तक एवं बेतवा पार कर उन्होंने चम्बल और यमुना तक अपनी सीमाओं का विस्तार कर लिया जिसे कालान्तर में खंगार गणराज्य के सर्वाधिक प्रख्यात गणाधिपति खेतसिंह खंगार ने अपनी जुझारू नीतियों के पालनपोषण में खंगार शासित भूभाग को "जुझौति" नाम दिया !
धसान और केन नदी के मध्य यौद्धेय खंगार जहाँ जहाँ भी समूह बद्ध हैं वे गाँव घार के गाँव के रूप में जाने जाते हैं भले ही वह परिक्षेत्र चंदेल राज्य की सीमा का भाग है किन्तु उस इलाके में "घार के खंगार" या "घार के गाँव" शब्द युग्म इस तथ्य को पुष्ट करते हैं कि खंगारों ने अपने खड्ग के दम पर उन गाँवों को चंदेल भूपतियों से विजित किया था !
आज के खंगार समाज में भी केन नदी तक बसे हुए खंगारो के मध्य घार के खंगार बेटी व्यव्हार करते हैं केन के उस पार के किसी भी व्यक्ति को जिसकी जड़ें घार में नही हैं उसे घार के खंगार मान्यता नही देते !
वहीं दूसरी ओर बेतवा और चम्बल के मध्य का भूभाग भी लगभग इसी परिपाटी को समृद्ध करता है ! खंगार भूपतियों ने बेतवा पार कर अपनी समृद्धि चम्बल और यमुना तक विस्तारित की यह परिक्षेत्र उन्होंने कदाचित चौरासी क्षेत्र के कुर्मियों और ग्वालियर के परिहारों से विजित किया किन्तु चम्बल पार भदौरिया शासकों से उनके मैत्री पूर्ण सम्बन्ध कायम हुए जिसकी झलक आज भी खंगार और भदौरिया समुदाय में दृश्यमान है तमाम इतिहासकार भदौरिया और खंगार शासकों में सम्बन्ध स्वीकार करते हैं भदावर के चौहान शासक भदौरिया नामसे विख्यात हुए ! खंगार भदौरिया संबंधों की अनेक कथाएं लोक में विख्यात हैं जिनका सार यह है कि खंगार और भदौरिया के मध्य प्रगाढ़ सम्बन्ध हैं जो रिश्ते में खंगार को भदौरिया का मातुल स्थापित करते हैं और आज भी यह परंपरा दोनों वर्गों में सतत विद्यमान है भदौरिया अपने संस्कारों में अपने निज मातुल के पूर्व खंगार मातुल को सम्मानित कर अपने जातीय संस्कारों को सम्पादित करते हैं जुझौति के खंगार शासन के उपरांत भी भदौरिया शासकों द्वारा खंगारों को संरक्षित किये जाने के अनेक उदहारण इतिहास में दर्ज हैं !
वहीँ दूसरी ओर खंगार शासकों का वैभव ग्वालियर के परिहारों को आतंकित कर रहा था ऐसे उदहारण हैं कि परिहार शासक शिविर शाह ने कौंच कालपी का अप्न क्षेत्र खंगारों से विकट संघर्ष कर पुनः हासिल कर लिया था !यह घटना 10 वीं शताब्दी की बताई !जो यह प्रमाणित करती है कि 10वीं शताब्दी के काफी पहले से खंगार शासक इस क्षेत्र में विद्यमान थे और यह दौर उनके शौर्य का साक्षी था ....!!
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*ब कलम*
"अशोक सूर्यवेदी एडवोकेट"
मऊरानीपुर (झाँसी) उ.प्र.
9450040227

Tuesday, May 12, 2015

जलता हुआ चलाचल आगे

" सूरज सिखलाता है तुझको ,जलता हुआ चलाचल आगे "

दुनियाँ में अँधियारा पसरा ,
तुझको राह दिखाए कौन ?
सक्षम तिमिर से लड़ने वाले ,
रहने लगे हैं अब तो मौन !
सबके अपने चाँद औ' तारे , तू किस का उजियारा माँगे ?
सूरज सिखलाता है तुझको , जलता हुआ चलाचल आगे !

सब सोये हैं जीव जगत के ,
सबके सब अगुआ को ताकें !
अगुआ अगुआ ढूंढ रहे सब ,
खुद को भुला रमायन बाँचें !
होकर ज्वलन्त बढ़ तू मग में , जगा उसे तू जो भी जागे !
सूरज सिखलाता है तुझको , जलता हुआ चलाचल आगे !

हो ज्वलंत जब तू निकलेगा ,
उजियारा तब होगा मग में !
जीवन की नव ज्योत जलेगी ,
क्रांति शुरू फिर होगी जग में !
तेरी हस्ती है छोटी भूल ,अब देख तुझे जनगण जागे !
सूरज सिखलाता है तुझको , जलता हुआ चलाचल आगे !

जब तक जलता चला चलेगा ,
बना रहेगा ज्योति स्वरुप !
यदि तूने रा' छोड़ी अपनी ,
तो हो जायेगा भद्दा कुरूप !!
जलना अपनी नियति बना ले , जब तक राख न उड़ कर भागे !
सूरज सिखलाता है तुझको , जलता हुआ चलाचल आगे !
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कृति
"अशोक सूर्यवेदी"

Sunday, May 10, 2015

यौद्धेय खंगार

खंगार उत्तर भारत की जुझारू जाति हैं जो मूल रूप से यौद्धेय संघ का आयुधजीवी गण है अपने संघ में अपने खंग आयुध कोधजीवी धारण करने वाले इस गण को "खंग आरोति इति खंगार " के कारण खंगार नाम मिला ! यौद्धेयगण का गौरवशाली इतिहास एक लगभग एक हजार वर्ष का स्वर्णिम इतिहास है ! इन्ही आयुधजीवी  खंगार यौद्धेय पूर्वजों के प्रबल पराक्रम से सिकंदर की सेनाओं ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था ! यौद्धेय प्राथमिक रूप से पंजाब में निवास करते थे कालचक्र के साथ आयुद्धजीवी यौद्धेय खंगार पंजाब से राजपूताना और गुजरात होते हुए विंध्य की उपत्यकाओं में बेतवा और धसान के मध्य आकर बस गए किन्तु प्रबल पराक्रमी यौद्धेय खंगार जिस जिस क्षेत्र में प्रवास करते हुए आगे बढे उस क्षेत्र में उनके शौर्य की गाथाएं प्रसिद्द हो गयी पंजाब गुजरात राजस्थान में खंगार शब्द की आदरपूर्वक चर्चा होती है उक्त प्रदेशों की लोक संस्कृति आज भी खंगार को अपने गीतों में अपनी परम्पराओं में अपने नामों में आदरपूर्वक स्थान देती है विभिन्न राजपूत जातियों ने आयुधजीवी खंगार वीरों जैसी संतति पाने की लालसा में अपने कुमारों का खंगार नामकरण किया "यथा नाम ततो गुण" होने से बहुधा इन खंगार नामधारी राजाओं के पराक्रमी होने पर उनके वंशज उनके नाम से स्मृत किये जाने लगे और और खंगार नाम धारी महापुरुष की संतति अपनी जाति में खंगार वंशज होने के कारण खंगारौत अथवा खांगर नाम से संबोधित हुई ! विभिन्न राजपूत और अन्य जातियों में आज भी प्रबल पराक्रमी आयुद्धजीवी खंगारों के नाम पर आज भी बालकों का नाम खंगार रखने की परंपरा है !
गणतंत्र के पालक पोषक आयुधजीवी यौद्धेय खंगार जब स्थायी रूप से बेतवा और धसान के मध्य के भूभाग में आकर बसे तब उन्होंने अपने इस भूभाग का नाम करण अपनी परम्परानुसार "घार" रखा जो कि समूह का उद्घोषक है यह "घार" शब्द यहाँ के स्थानीय निवासियों में आज भी अत्यधिक प्रचलित है !
समुद्रगुप्त की " प्रयाग प्रशस्ति " में इस क्षेत्र को जांगल प्रदेश कहा गया है जिसके स्वामी गणों ने समुद्रगुप्त को प्रणाम से संतुष्ट किया !
कालान्तर में आयुद्धजीवी खंगार गण बेतवा और धसान के पार क्रमशः केन , सिंध एवं यमुना नदी तक अपने भूभाग का विस्तार करने में सफल रहे और खंगार भूपतियों ने अपने शासित भूभाग का नामकरण 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में "जुझौति" कर लिया जो उनकी जुझारू नीतियों का परिचायक था !
सीमावर्तीधढडीढडी चंदेल और परिहार शासकों से खंगार गणनायकों की कभी नही बनी सीमाओं के विस्तार को लेकर उनमे हमेशा ठनी रही तत्समय दिल्ली के अधीश्वर पृथ्वीराज चौहान से खंगार गणनायक खेतसिंह खंगार ने मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लिए और चौहानों के साहचर्य में चंदेल सत्ता को धूलधूसरित कर दिया पृथ्वीराज की ओर से  पज्जुन राय को महोबा का प्रशासक नियुक्त किया गया  और विजित क्षेत्र खंगार नायकों के अप्रत्यक्ष रूप से अधिकार में आगया ! चंदेलों के पराभव ने ग्वालियर के परिहार शासकों को भी सबक दे दिया और उसके बाद उन्होंने कभी खंगार भूमि की ओर आँख उठाकर देखने का दुस्साहस नही किया और खंगारगण से किंचित मैत्री सम्बन्ध भी स्थापित कर लिए ..!
कालचक्र में आगे जब 1347 ई. में जुझौति का शासन खंगार गणाधीश्वर महाराज मानसिंह सम्हाल रहे थे तब
राजकुमारी केशर दे के स्वाभिमान और सम्मान की खातिर आयुद्धजीवी यौद्धेय खंगार अपनी जुझारू नीतियों के पालन पोषण में मुहम्मद तुगलक से युद्धरत हुए इस युद्ध में जुझौति का बच्चा बच्चा अपनी मिटटी की अस्मिता की खातिर जूझ गया 9 माह के भीषण युद्ध के बाद खंगार गणसत्ता अपने ही भेदियों के कारण पराभूत हुई इस युद्ध की गौरवशाली गाथा आज भी खंगार भूमि के  लोकोत्सव "नारे सुअटा " "जिंझिया" और "टेसू" के गीतों में मुखरित होती है !
जुझौति प्रदेश 1347 ई के इस खंगार तुगलक युद्ध के बाद बीरान होगया भारी उथल पुथल के समय में यौधेय खंगार अपनी आयुधजीवी वृत्ति के कारण सीमावर्ती राज्यों में सैन्य सेवायें देने लगे भदावर में शल्यदेव भदौरिया का सेनापति भूपत सिंह खंगार और मालवा में मेंदिनी राय खंगार इस बात के पुष्ट प्रमाण हैं !
दिल्ली में मुग़ल सत्ता स्थापित कर बाबर ने चंदेरी मेदिनी राय से फतह कर ली और इस घटनाक्रम के बाद रुद्रप्रताप बुंदेला को जुझौति का गवर्नर नियुक्त किया तदन्तर रुद्रप्रताप ने ओरछा को राजधानी बनाया और जुझौति में बुंदेला राजवंश की स्थापना की ! बुंदेला राजसत्ता में भी आयुधजीवी खंगार सेना में बड़े पदों पर आरूढ़ थे ओरछा में राजा जुझार सिंह बुंदेला का सेनापति पहाड़ सिंह और कालान्तर में पन्ना महाराज बुन्देल केशरी छत्रशाल के सेनापति किशोरी खंगार का वर्णन प्राप्त होता है ! मराठा काल में झाँसी की सेना में "कुँवरजी" नामक दल खंगारों का था ऐसा झाँसी के  विद्वान इतिहासकार दावा करते हैं !  1857 का विद्रोह भारत के आमजन का विद्रोह था झाँसी में 1857 का विद्रोह खड़ा करने में लोधी गुसाईं और खंगारों का अविस्मर्णीय योगदान था ! 1857 की  इस बगावत से ब्रिटिश शासन को ये जातियां अत्यधिक खटक गयी थीं और कंपनी सरकार इन लड़ाकू जुझारू स्वतंत्रता प्रेमी जातियों के दमन के लिए "क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट" नामक काला कानून लेकर आई और देश भर की 160 स्वतंत्रता प्रेमी जातियों सहित खंगारों को अपराधी जाति नामित कर खंगार जाति के लोगों को ढूंढ ढूंढ कर इस काले कानून के हवाले किया जाने लगा बहुतेरे खंगार आत्मरक्षार्थ जंगलों में उतर गए और ब्रिटिश सरकार की नाक में दम करते हुए स्वातंत्र्य की अलख जागते रहे ! बहुतों ने ब्रिटिश शासन के मापदंडों पर उनकी शर्तों पर आजीविका चलाना स्वीकार कर ग्राम चौकीदार का पद स्वीकार कर लिया तथापि अंग्रेज खंगार खतरे से भयभीत रहे उन्हें खंगार संगठित होकर फिर क्रांति न कर दे इसका भय सताता रहा अतः उन्होंने एक गांव में एक ही खंगार परिवार बसाया और उसकी बसीकत भी हीनजातियों के साथ कर दी ताकि आगे चलकर उनकी स्वतंत्रता की इच्छा हमेशा हमेशा के लिए मर जाये ! बहुतेरे खंगार परिवारों को उनके हितैषी परिहार परिवारों ने अपनी जाति परिहार बताने के लिए उकसाया और अंग्रेजों के पूंछे जाने पर उन्होंने खंगार परिवारों को परिहार परिवार बताया इस प्रकार कुछ  खंगारों  ने अपनी पहचान तात्कालिक संकट से बचने हेतु छुपाली और खंगारों में परिहार बताने का तात्कालिक उपाय रूढिबद्ध हो गया और खंगार पटिया (भाट) अपने स्वामी खंगारों की प्रशस्ति में उनका कुल गौरव परिहार राजपूतों से जोड़ने की भ्रमित और अतार्किक होड़ में शामिल हो गए और अपने लेखन में  गणतंत्र के पालक पोषक  यौद्धेय खंगारगण के मूल अस्तित्व से भटक गए !
1952 में स्वतंत्र भारत की सरकार ने स्वतंत्रता प्राप्ति के 5 साल बाद ब्रिटिश शासन के दौरान अपराधिक जातियों में नामित खंगार सहित सभी जातियों को विमुक्त जाति अधिनयम बनाकर क्रिमिनल ट्राइब्स नामक काले कानून से मुक्त तो कर दिया किन्तु इन जातियों के उन्नयन के लिए आज तक किसी सरकार ने जमीनी प्रयास नही किये ! पिछली कांग्रेस सरकार ने रेणके कमीशन गठित कर इन जातियों के विकास के लिए रिपोर्ट मांगी थी किन्तु रेणके कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का प्रयास अभी तक किसी ने नही किया .............मेरा एकमात्र सवाल है अंग्रेज तो हमारे दुश्मन थे आप तो हमारे अपने बनाये शासक हो फिर गणतंत्र के पालक पोषक हम स्वतंत्रता प्रेमी यौद्धेय खंगारों और हमारी ही तरह की अन्य यौद्धेय जातियों और स्वंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली वीर संततियों की उपेक्षा कर रहे हो ......???

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*बकलम*
अशोक सूर्यवेदी एड.
9450040227

Saturday, March 21, 2015

गढ़ कुण्डार का जौहर

ईसवी सन् 1347 की बात है  जुझौती वसुंधरा युद्ध की आग में दहक रही थी । #खंगार  राजकन्या केशर दे के स्वाभिमान को लेकर छिड़ी यह जंग जुझौती के आमजन के स्वाभिमान की जंग बन चुकी थी स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े सभी वर्ग #कुण्डार  के महामहल की प्रतिष्ठा के लिए नौ माह से जूझ थे । बर्बर तुगलक की बड़ी सेना के सामने पराजय सुनिश्चित थी पर यह भूमि तो जुझारू संस्कृति के पालक पोषक खंगार भूपतियों की थी जिन्होने झुकना नहीं जूझ के ही जीना मरना ही सीखा और सिखाया था ।  महिलायें सुबह से अपने पति , पुत्र और भाइयों को विजय तिलक कर यह वचन देकर भेजने लगी कि #ठाँडे रै तो गढ़ गढ़ जै हैं , बैठे भये तो सर्गै जैंहें" अर्थात जब तक हम में समर्थ है तब तक हैम भी जुझौती के हर गढ़ और मोर्चे की सुरक्षा में सनद्ध रहेंगे और सामर्थ चुकने पर अग्नि का वरण कर जय जय हर कर जौहर करेंगी । गाँव गाँव में शाका वृत लेकर पुरुष युद्ध में कून्द पड़े और महिलाएं आत्मरक्षार्थ जौहर की आग में कूंदने लगीं।
गढ़कुंडार के अधिश्वरों को खंगार राजकुल देवी #गजाननमाता का वरदान था कि कुंडार महामहल किसी भी हमले में नही टूटेगा पर होनी को कुछ और ही मंजूर था साजिशन माता के ऊपर रक्त छिड़का गया देवी का वरदान टूट गया और यहाँ से युद्ध की तश्वीर बदलने लगी  । चैत्र की नवरात्रि का आगमन हुआ महाराज मानसिंह खंगार पूरे वेग से युद्ध कर रहे थे पर होनी को कुछ और ही मंजूर था महाराज मानसिंह वीरगति को प्राप्त हुए महारानी देवल दे ने जौहर वृत का पालन किया किन्तु युद्ध रुका नही राजकुमार #बरदाई सिंह ने छत्र धारण किया और खंगार कुल कन्या केशर दे ने भरोसा दिया कि मेरे जीते जी तुगलक की फतह नही होगी मैं "बा असि खौं कोउए न दैं हों , ता आती खौं लप लप खैं हों " अर्थात मैं उस तलवार को किसी को नही दूंगी ( समर्पण नही करुँगी ) और आती हुई सेना का विनाश करुँगी ! खंगार सेना शाका लेकर मैदान में कून्द पड़ी भयंकर मार काट मची खंगार योद्धाओं का अप्रतिम शौर्य शत्रु सेना में भय उत्पन्न कर गया वे सिर्फ मरने मारने को युद्ध में थे हर हर महादेव के भीषण हुंकार से तुगलक सेना "गीली-पीली" होने लगी । तुगलक सेना की कमान फिरोज शाह का साला सम्हाल रहा था बरदाई सिंह ने हुंकार कर कहा "दो दो पैसे के नौकर नाहक डारौ मूड़ कटाये , हमरी तुम्हरी आन बनी है आ दो मैं एक रह जाये " ....!  खंगारों का संख्याबल भले ही कम था पर मनोबल के वे धनी थे भाग्य की बिडम्बना थी भेड़ियों ने सिंहों को घेर कर नेस्तनाबूद कर दिया । शत्रु सेना कुण्डार के महामहल तक पहुँच गयी राजकुल की वीरांगनायें केशर दे के नेतृत्व में राष्ट्र धर्म के परिपालन को कटिबद्ध थी खंगौरिया पहनने वालीं काली का साक्षात्कार कराने को तत्पर थी "ता आती को" लपलप खाना शुरू कर दिया गया बहुतेरे शत्रु सैनिक रणचंडियों की भेंट चढ़ गए "शत्रु प्रबल था और राष्ट्रधर्म की सुरक्षा अनिवार्य" दामन पर दाग न आये इसलिए जौहर की आग प्रज्ज्वलित कर दी गयी माताओं के बच्चे दुधमुंहे थे वे शत्रु के हाथ पड़कर दास न बन जायें सो माताओं ने अपने कलेजे के टुकड़े अपने हाथों से काट डाले ( "सारे वारे फूल सिराये ताकि जीवे गढ़कुंडार" ) और राष्ट्रधर्म के परिपालन में राजकुमारी केशर दे सहित वीरांगनाओं ने जौहर की यज्ञानल में सर्वस्व की आहुति दे दी । जेता जीत के भी पराजित था और कुंडार का महामहल सर्वस्व निछावर कर आज भी अपनी बलिदानी संतति पर गर्वित है ............"अशोक सूर्यवेदी"