Thursday, September 21, 2017

कृतघ्न औलादें

वृद्ध था पर बीमार नही था वह बुजुर्ग , उसके चेहरे पर गौरवशाली अतीत की आभा दमक रही थी , उसके शरीर पर स्वाभिमानी धवल वस्त्र थे जो उसकी अनवरत दृढ़ता और राष्ट्र को समर्पित सेवाओं के परिचायक थे ! सधे हुए कदम बढ़ाता वह बुजुर्ग चला आ रहा था अपने  बच्चों को लिए अतीत से अनन्त की यात्रा पर  और कि तभी नियति का रोड़ा रास्ते में आया और बेपरवाह वृद्ध उसमें उलझकर कीचड़ में जा गिरा और सिर से पांव तक कीचड़ में सन गया उसके बच्चे जो उसके पीछे थे वे अपने पिता को इस हालत में पिता स्वीकार करने को भी राजी नही हुए और जिंदगी बिना पिता के नाम के जी पाना सभ्य समाज में कहाँ आसान होती है ! जिस पिता का स्वाभिमान से पूरित पोषित अकलंकता से युक्त वैभवशाली नाम था वह तो कीचड़ युक्त हो गया था और मूर्ख संतति उस आदर्श के शिखर को कीचड़ से बाहर निकालने की बजाय नया बाप तलाशने लगी , वर्तमान के शहर में एक जीन्स टी-शर्ट वाला नौजवान दिखा वृद्ध के बच्चे दौड़ कर पापा पापा कहते उसके पैरों से लिपट गए  नौजवान भौचक्का उसे लगा अनाथ हैं शायद तो थोड़ी दया दिखा दी , पर नौजवान के बच्चे अपने पापा को किसी के साथ कैसे बाँटते सो जूते उठाये गए और वृद्ध के ढीठ हो चुके बेशरम बच्चे गाली जूते खाते और दूसरे के बाप को अपना बाप साबित करने की निरर्थक कोशिश करते रहे और कीचड़ में सना वृद्ध अपनी बेवसी पर आँसू बहाता रहा इस इंतजार में कि कभी तो कोई आकर मुझे इस कीचड़ से निकालेगा और पुनः स्थापित होगा मेरा मान सम्मान और स्वाभिमान ..............!!
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ब कलम
अशोक सूर्यवेदी

Saturday, September 9, 2017

शिक्षा मित्र

पड़ौस के गाँव में रमजान अपनी बीबी परवीन  के साथ रहता था जब गाँव में रोजगार का कोई आसरा न रहा और घर में सास बहू की खटपट बढ़ी तो हस्तकला  में माहिर रमजान  गाँव छोड़कर कस्बे में आ बसा ! शादी के समय रमजान  की बीबी खास पढ़ी लिखी तो न थी पर रमजान  ने उसको शादी के बाद पढ़ने लिखने को प्रेरित किया और परवीन ने घसीट पीटकर बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ही ली ! क़स्बे में रहमान की बढ़ईगिरी  ठीकठाक चल निकली  और मियां बीबी अपनी गृहस्थी  में रम गए ! अल्लाह के फज़ल से परवीन को चाँद सी खूबसूरत दो बेटियां हुईं बड़ी बेटी की उम्र इन दिनों १६ की है और छोटी बेटी १२ की है ! रमजान  और परवीन की जिंदगी में  वह समय उलटफेर का कारक बनकर आया  जब सूबे की सरकार ने विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए शॉर्टकट अपनाया और संविदा पर शिक्षामित्रों की नियुक्ति की गयी ! ये शिक्षा मित्र गाँव के प्रधान की संस्तुति पर गाँव के १२वीं पास युवक और युवती नियुक्त होने थे ! रहमान ने भी  प्रधान जी से  आरजू मिन्नत करकरा के परवीन को शिक्षा मित्र नियुक्त करा लिया और  मोहतरमा परवीन खातून गाँव के प्राइमरी स्कूल में "मैडम" हो गयीं !
गृहस्थी तो क़स्बे में बसा रखी थी और पढ़ाने गाँव में जाना होता था सो  मैडम के शौहर ने मैडम की शान के अनुरूप  स्कूटी  का प्रबंध करा दिया अब मैडम  का मानदेय तो था दो हजार  रुपया मात्र और स्कूटी का खर्चा ढाई हजार महीने का और ऊपर से मैडम के चेहरे की चमक बनाये रखने का ब्यूटी पार्लर का खर्चा अलग कुल मिलाकर आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया , अंटी तो ढीली रमजान  की होनी थी सो खूब हो रही थी और रमजान  भी तनिक गिला न करता कारण कि जैसे डॉक्टर की बीबी को पड़ौसने डॉक्टरनी  बुलाती हैं ठीक वैसे ही रहमान को यार दोस्त "मास्साब" कहने लगे थे  सो गिला तो होना ही न था और वैसे भी कहावत है नाम दरोगा धर दो भले वेतन अठन्नी कर दो   कुलमिलाकर रमजान  मास्साब शान में भूले बसूला ही चलाते रहे   और मैडम सहकर्मी  शिक्षामित्र  की पर्सनाल्टी पर आशक्त होती गयीं  ! नैनों ने कब इशारों इशारों में दिल की हसरतें बयां कर दी और शिक्षामित्रों को एक दूसरे के आगोश में ला दिया किसी को पता ही न चला लेकिन नेह के नैन और इत्र की चोरी भला कब तक छिपते सो स्टाफ में कानाफूसी तेज हो गयी हेडमास्टर ने  समझाने  की कोशिश की तो आशनाई के रथ पर सवार प्रेमियों ने उसे कायदे से धमका डाला चूँकि शिक्षामित्र  अपनी हुड़दंग नेतागिरी के लिए खासे चर्चित हैं सो  साठ  हजार  वेतन पाने वाला हेडमास्टर दो हजार मानदेय वाले शिक्षा मित्रों के मामले में बिलकुल शांत हो गया ! और शिक्षामित्र जोड़े की रंगीनियाँ खुलकर फरुक्खावादी हो गयीं ! सहकर्मी शिक्षामित्र के व्यक्तित्व के आगे अब भला बसूला वाला अँगूठाटेक रमजान  कहाँ भाता सो मैडम घर में होकर भी रमजान से कटी कटी रहने लगीं और घर में भी ज्यादातर समय स्मार्टफोन पर बिताकर सुबह जल्दी ही स्कूल जाकर देर शाम घर आने लगीं !
 इसी बीच सूबे की सरकार ने वोटों के लालच में सारे मानकों , नियमों और अध्यादेशों को धता बता कर शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक का तोहफा दे डाला और शिक्षा मित्र दो हजार के मानदेय से उछलकर ३५ हजार की वेतन को प्राप्त हो गए ! सहायक अध्यापक के पद और वेतन के आगे अब रमजान का बसूला निश्चित रूप से बहुत छोटा पड़ गया था ! प्रेमी जोड़े को प्यार की   पींगें बढ़ाने के लिए अब सारी  बाधाएँ पार होती नजर आने लगीं थीं अब दोनों सहायक अध्यापक  हो चुके शिक्षामित्र  अपनी दुनिया अपनी गृहस्थी बसाना चाह  रहे थे और कोई बाधा  बची भी थी तो वो थी रमजान और परवीन की शादी जिसे तोडना जरुरी था परवीन ने रमजान से सीधे शब्दों में तलाक माँगते हुए कहा नहीं हो तुम मेरे लायक ,नहीं रहना है तुम्हारे साथ ,  दे दो  मुझे तलाक़,  जीने दो मुझे अपनी जिंदगी....... . नेकदिल  इंसान था रमजान बहुत प्यार  था बीबी से  बच्चों में बसती थी उसकी जान , सुनकर हुआ हैरान परेशान बोला   मेरी  जान , होश में आओ , क्या कहेंगे परिवार और पड़ौसी ,  क्या मुंह दिखाएंगे हम समाज और रिश्तेदारों को , बच्चे बड़े हो गए हैं कुछ उनका तो सोचो बड़की हो गयी है सोलह साल की उसे जल्द ही डोली में बिठाना  है और तुम्हें अब अपना नया आशियाना सजाना है ? कुछ तो तरस खाओ मोहतरमा ,  मुझे यूँ रुसवा न करो कुछ तो अल्लाह से डरो ,पर प्रेम की मादक मदिरा में मदहोश परवीन को न कुछ समझ आया और न ही उसने कुछ समझाना ही चाहा  ! घर जंग का मैदान बन गया खूब बर्तन बजे खूब तमाशा हुआ पर रमजान के मुंह से तीन बार तो क्या एक  बार भी तलाक न निकला और परवीन की मज़बूरी ये कि मजहबी कानून  ने उसे तीन तलाक का हक़ अदा  नहीं किया वर्ना कब की तीन बार  ता ता ता कह कर  खिसक ली होती  ! बड़े  बुजुर्ग बैठे समझाईशो के दौर चले पर कोई फर्क न पड़ा परवीन के वालिद  एक दशक पहले ही अल्लाह को प्यारे हो गए थे और परवीन ने अपनी अम्मा को अपने रंग में कायदे से उतार लिया था सो सारी  समझाइशें बेकार होनी ही थीं सो होकर रहीं ! मसला जब घर वालों से न सम्हला सो कचहरी के दरवाजे आन  खड़ा हुआ , इधर  वकील साहब ने मुक़दमें की कमान सम्हाली और उधर  देश के उच्चतम न्यायालय  ने विचाराधीन शिक्षामित्रों के सहायक अध्यापक नियुक्त किये जाने पर फैसला सुनाते हुए  सूबे के शिक्षामित्रों की सहायक अध्यापक के तौर पर नियुक्ति को गैर क़ानूनी करार दिया और  उन्हें सहायक अध्यापक के पद से अपदस्थ कर दिया ! सुप्रीम कोर्ट का फैसला  प्रेमी शिक्षामित्र  जोड़े पर गाज बनकर गिरा प्रेम का नशा काफूर हो गया प्रेमी शिक्षामित्र की चारपहिया गाड़ी  कम्पनी वाले उठा ले  गए मोटर साइकिल कर्जदारों ने छीन ली !  अब परवीन में  न घर बसाने की तमन्ना बची थी न इश्क की अंगड़ाई  अब  सम्हालने को  कुछ बचा था तो बस वो ही रमजान के बसूले का सहारा .... और इस  तरह लौट के बुद्धू घर को आयी .....!!

शब्द संयोजन
अशोक सूर्यवेदी
          एडवोकेट
मऊरानीपुर झाँसी

Saturday, August 12, 2017

इंसेफेलाइटिस :- अपनी भी तो कुछ जिम्मेवारी तय करें

खबरिया चैनल , अखबार , सोशल मिडिया के शूरमा और राजनैतिक गलियारों के पुरोधा बीते दिनों गोरखपुर में इंसेफेलाइटिस  बच्चों की मौत पर व्यथित हैं ! गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इंसेफेलाइटिस से बच्चों की मौत की खबर एक बार फिर 'सुर्खियां' बनी है. हम 'सुर्खियां' इसलिए कह रहे हैं क्योंकि गोरखपुर समेत पूरे पूर्वांचल में हर साल इस बीमारी के सैंकड़ों बच्चे शिकार हो जाते हैं. लेकिन मौत की 'चीखें' कभी-कभी ही खबर या राजनीति के लिए मुद्दा बन पाती है सत्तापक्ष और विपक्ष एक दूजे पर हमलावर हैं और हम केवल राजनीती पर मौतों को थोपकर मुंह नहीं मोड़ सकते हमें अपनी भी जिम्मेवारी तय करनी होगी !

गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज में साल 2012 से 11 अगस्त 2017 तक करीब 3 हजार बच्चों की मौत हुई है, इनमें से ज्यादातर की मौत इंसेफेलाइटिस के कारण से ही हुई है ! पूर्वांचल का इलाका इस बीमारी की चपेट में है पिछड़े पूर्वांचल में बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज पूर्वांचल के १३ और बिहार के समीपवर्ती ६ जिलों के मासूमों के लिए इस जानलेवा बीमारी से लड़ने का एकमात्र सहारा है गोरखपुर का बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज, आसपास के दूसरे जिलों के लिए एकमात्र सहारा है.  
इस बीमारी से यहां के बच्चों का उपचार करने के लिए गोरखपुर स्थित बाबा राघवदास मेडिकल काॅलेज में 100 बेड का अलग से इंसेफेलाइटिस वार्ड बनाया गया है। डा़ॅ काफिल खान ने बताया कि दूषित पानी और मच्छर के काटने से फैलने वाली यह बीमारी 1978 में कई देशों में दस्तक दी थी लेकिन अधिकतर देशों ने टीकाकरण और दूसरे प्रयासों से इस बीमार पर काबू पा लिया। लेकिन पूर्वांचल में यह घटने की बजाय हर साल बढ़ रही है।
इंसेफेलाइटिस वार्ड में हर महीने भर्ती होने वाले मरीजों का आंकड़ा देते हुए उन्होंने बताया कि अगस्त से लेकर अक्टूबर तक इस बीमारी का प्रकोप तेजी से बढ़ता है़ आम दिनों में रोजाना एक से लेकर दो केस आते हैं वहीं अगस्त आते ही यह आंकड़ा सैकड़ों गुना बढ़ जाता है। पिछले साल अगस्त में यहां पर 418 बच्चे भर्ती हुए जिसमें से 115 बच्चों की मौत हो गई जबकि दिसंबर 2016 में 134 बच्चे भर्ती हुए ओर इसमें से 46 की मौत हो गई।
बात अगर इस साल की करें तो जनवरी 2017 से लेकर अभी तक 488 बच्चे भर्ती हुए इसमें से 129 बच्चों की मौत हो गई। जिससें शुक्रवार को आक्सीजन की कमी से मरने वो बच्चों की संख्या को शामिल नहीं किया गया है।
इंसेफेलाइटिस बीमारी को लेकर पूर्वांचल में राजनीति भी खूब हुई यहां पर होनी वाली बच्चों की मौत हर साल सुर्खियां भी बनी। गोरखपुर से पांच बार बीजेपी सांसद रहे और प्रदेश की बागडोर संभाल रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर यहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने समय-समय पर इसको लेकर आवाज उठाई लेकिन नतीजा वहीं ढाक के तीन पात रहा।
प्रदेश बीजेपी की सरकार बनने पर योगी आदित्यनाथ भी इस बीमारी की रोकथाम के लिए कुछ नहीं कर पाए वहीं सपा सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। स्थिति यह है कि यहां पर एक ही बेड पर जहां तीन-तीन इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों को रखना पड़ता है वहीं यहां पर काम कर रहे नर्स और कर्मचारियों को समय से वेतन तक नहीं मिलता।
हर साल जुलाई से लेकर दिसंबर तक काल बनने वाली यह बीमारी एक मादा मच्छर क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस के काटने से होती है। इसमें दिमाग के बाहरी आवरण यानी इन्सेफेलान में सूजन हो जाती है। कई तरह के वायरस के कारण ब्रेन में सूजन के कारण हो सकते हैं। कई बार बॉडी के खुद के इम्यून सिस्टम के ब्रेन टिश्यूज पर अटैक करने के कारण भी ब्रेन में सूजन आ सकती है। यह बीमारी सबसे पहले जापान में 1870 में सामने आई जिसके कारण इसे ‘जापानी इंसेफेलाइटिस’ कहा जाने लगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2014 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में विशेष तौर पर सुदूर पूर्व रूस और दक्षिण पूर्व एशिया में इस रोग के कारण प्रति वर्ष करीब 15 हजार लोग मारे जाते हैं। इस बीमारी की सबसे खराब बात ये है कि कई केस में मरीज बच जाने के बाद भी पैरालिसिस या कोमा के शिकार हो जाते हैं , मतलब मरीज बच भी जाए तो जिंदा ही रहता है, जी' नहीं पाता.
इंसेफेलाइटिस जानलेवा बीमारी है, इससे या तो मौत होती है या आजीवन विकलांग होने की संभावना होती है।
यह बीमारी मच्छर, सूअर, दूषित पानी, खुले में शौच करने से फैलता है।
इस बीमारी के मच्छर शाम के समय घर से बाहर सबसे ज्यादा काटते हैं।
शाम को खुले में शौच करने से इनके काटने की संभावना ज्यादा होती है।
इस बीमारी के रोगाणु पानी में मल के मिलने से फैलते हैं।
खुले में शौच करने से इसके रोगाणुओं का प्रसार होता है।
हैण्ड पंपो के आसपास इकट्ठा पानी में इसके रोगाणु ज्यादा पनपते है।
ऐसे कर सकते है रोकथाम
मच्छरों के काटने से बचे। शाम के समय बच्चों को बाहर लेकर कम निकले और बैठे।
रात में सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें।
खुले में और सड़क के किनारे शौच न करें।
नजदीक के स्वास्थ्य केन्द्रों पर बच्चों को जेई का टीका आवश्य लगवाएं।
सूअर और बाड़ों को आबादी से दूर रखे।
खाने के पहले और शौच के बाद हाथ को सफाई से धोएं।
पीने के पानी में क्लोरिन गोली का उपयोग करें।
क्लोरिन गोली को कागज में न रखे, दवा बेअसर हो जाती है।
दूषित जल (कम गहरे वाले हैंडपंप, तालाब, कुएं का पानी आदि) का सेवन न करें।
पीने के लिए इण्डिया मार्का हैण्डपंप 2 का प्रयोग करें।
गोलगप्पे, बर्फ के गोले, जूस, ठंठई, गीली हरी चटनी आदि को खाने के पहले पानी की शुद्धता के बारे में जानकारी कर लें।
कच्चे कंद मूल, सब्जियों, फलों को खाने के पहले अच्छी तरह से धो लें।
घर के आस-पास झाड़ियों को उगने न दें।
घर के अन्दर चूहों को न आने दे।
शाम के समय नंगे बदन बाहर न बैठे और न निकले।
नीचे जमीन पर और घास पर नंगे बदन न लेटे।
प्रोटीन युक्त आहार का सेवन करें। 
और ये सब काम हमें ही करने होंगें कोई योगी या अखिलेश अकेले हमें या हमारे बच्चों को  सुरक्षित नहीं रख सकते !

Tuesday, March 14, 2017

बुंदेलखंड के चंद्रवेदी

बहुत पुरानी बात है जिन दिनों देश में अराजकता का माहौल था राजपथों पर लूट आम बात थी और लोग अपने धन को सदरी जूते के शोल आदि में छिपाकर यात्रा किया करते थे उन दिनों बुंदेलखंड की दतिया रियासत के ररुआ गाँव में राम लाल और मदन प्रसाद नाम के दो विद्वान मित्र थे ! कहते हैं कि उनमें से एक को भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास होता था और दूसरे को पक्षियों की भाषा का ज्ञान था ! एक दिन दोनों मित्र एक नदी किनारे थे तभी उन्हें जगन्नाथपुरी की यात्रा पर जाते एक धनी दंपत्ति मिले ,जब वे दोनों पानी पी रहे थे तब नदी किनारे पेड़ पर बैठा एक कौआ कांव कांव कर रहा था दोनों मित्रों में से पक्षियों की भाषा जानने वाले मित्र ने दूसरे से कहा कि यह कौआ कह रहा है कि जो कोई इस दंपत्ति की छड़ी को अपने कब्जे में लेगा वह बहुत ही धनी हो जायेगा ! वास्तव में तीर्थ यात्री दंपत्ति अपनी छड़ी में स्वर्ण मुद्रायें छिपाये हुए थे , मदन प्रसाद और रामलाल ने अपनी किश्मत आजमाने की सोची और दोनों ही तीर्थयात्री दंपत्ति के साथ हो लिए और उनके साथ घुलमिल गए  जैसे ही रामलाल और मदन प्रसाद को मौका मिला वे दोनों उस तीर्थयात्री की छड़ी लेकर चंपत हो गए !
                      अपनी पहली सफलता से उत्साहित दोनों मित्रों ने न केवल इस कारगुजारी को अपना व्यवसाय बनाया बल्कि अपने गाँव ररुआ में इस कौशल को सिखाने के लिए एक निजी संस्थान की स्थापना भी की जहाँ उठाईगिरी को एक कला के रूप में विकसित किया गया छोटे बच्चों को दिन में  चीजों को उठाने की कला सिखायी जाने लगी ! प्रवेश के समय विद्यार्थियों को चंद्रमा की शपथ दिलायी जाती थी कि वे कभी भी रात में या कि चंद्रमा की उपस्थिति में चौरकर्म नही करेंगे कदाचित उनका विश्वास था कि यह एक कला है जिसका प्रदर्शन वे सिर्फ दिन के समय जागृत लोगों के समक्ष ही करेंगे अन्यथा नही ! जब उनकी कीर्ति बढ़ी और यह चर्चा दतिया महाराज भवानी सिंह के कानों तक पहुंची तब उन्होंने खुद जाकर इस संस्थान का निरीक्षण किया और पाया कि इस संस्थान में राष्ट्रभक्ति की धारा प्रवाहित हो रही है और ये लोग वास्तविक अर्थों में राज्य के लिए  सच्चे वफादार और फायदेमंद लोग हैं दतिया महाराज संस्थान के साधकों से इस क़दर प्रभावित थे कि वे उन्हें सालाना आयोजित होने वाले दिल्ली दरबार में यात्रा के दौरान अपनी और अपनी संपत्ति के सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में साथ ले कर गए , संस्थान के इन साधकों ने अपने उत्तरदायित्व का बड़ी जिम्मेवारी से निर्वहन किया कि जब "दरबार" में यह सवाल उठा कि विभिन्न राज्यों में किस वर्ग के लोग राज्य के प्रति सबसे वफादार और लाभदायक हैं तो दतिया महाराज ने न केवल रामलाल और मदन प्रसाद के अनुयायियों का नाम लिया वर्न राज्य के प्रति उनकी सेवा समर्पण और बफादारी की मिसालें भी पेश कीं चर्चा के दौरान रामलाल और मदन प्रसाद के अनुयायियों के सरोकार और कार्यव्यवहार के कारण प्रथम बार उन्हें चंद्रवेदी नाम दिया गया ! चंद्रवेदी कहलाने के पूर्व ये लोग मदन प्रसाद और रामलाल के कुलनाम सनौरिया से जाने जाते थे , सनौरिया ब्राह्मणों की एक शाखा होती है और खंगारों की भी एक शाखा सनौरिया कहलाती है अतः रामलाल और मदन प्रसाद किस जाति के थे यह दृढ़ता पूर्वक कभी नही कहा जा सका !कुछ विद्वानों ने सनौरिया को ब्राह्मण और कुछ ने ठाकुर की उपशाखा भी माना ! हालाँकि सनौरिया जो बाद में चंद्रवेदी कहलाये किसी एक जाति का नही बल्कि चमार और मेंहतर के अतिरिक्त बुंदेलखंड की तमाम स्थानीय जातियों का संगठित गिरोह था ! जिनमें खंगार , सुनार , लोधी, सनौरिया ब्राह्मण , कायस्थ , काछी और गडरिया आदि जातियों के लोग शामिल थे ! चंद्रवेदी लंबे अरसे तक एक जाति के रूप में भले ही पहचाने गए लेकिन वे आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नही करते थे हालाँकि गिरोह के अन्य साथियों के वैवाहिक कार्यक्रमों में वे सक्रिय भागीदार होते थे !
                   चंद्रवेदी संस्कृतनिष्ठ शब्द है जिसे विद्वानों ने तीन तरह से कहा है 
(१) चन्द्रभेदी:- वे लोग जिनके चौर्यक्रम चंद्रमा द्वारा प्रकट हो जाते हैं !
(२) चंद्रवेधी:- वे लोग जिनके क्रियाकलाप चन्द्रमा के प्रकाश में प्रकट हो जाते हैं ! 
(३) चंद्रवेदी:- वे लोग जो चंद्रमा की उपस्थित में गलत क्रिया कलाप नही करते हैं !

संस्थान में प्रवेश :- रामलाल और मदन प्रसाद द्वारा स्थापित ट्रेनिंग स्कूल में बालकों एवं वयस्कों को उठाईगीरी सिखाने के लिए प्रवेश के समय अलग अलग प्रक्रिया से सौगंध लेनी पड़ती थी बालकों को पूर्णिमा की रात चंद्रमा की उपस्थिति में चंद्रमा की सौगंध दिलाकर शपथ दिलायी जाती थी कि चंद्रमा उनका इष्ट है और वे चंद्रमा कि शपथ लेकर कहते हैं कि वे (बालक) चंद्रमा की उपस्थिति में कभी भी चौर्यकर्म नही करेंगे , वहीं दूसरी ओर वयस्कों से इसके अतिरिक्त तुलसी गंगा लेकर वचन लिया जाता था कि वे (वयस्क) किसी भी हालत में अपने गिरोह से दगा नही करेंगे और न ही वे कभी किसी पर गिरोह के राज उजागर करेंगे !हालांकि संस्थान में वयस्कों की अपेक्षा बालकों  के प्रवेश को ज्यादा तहजीर दी जाती थी क्योंकि प्रशिक्षकों का मत था की वयस्कों की अपेक्षा बालक ज्यादा तेजी से सीखता है और उसे प्रशिक्षित किया जाना ज्यादा आसान है संस्थान को प्रशिक्षक को नालबंद कहा जाता था और एक नालबंद के आधीन प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले बालकों की संख्या अधिकतम आधा दर्जन तक होती थी !

शैक्षणिक गतिविधियां :-  संस्थान में चौर्यकला का  प्रशिक्षण भाषा पर केंद्रित था ! यह  भाषा दो भागों में विभक्त थी ! पहली गुप्त शब्दावली पर आधारित थी जिसे परसी  कहा जाता था और दूसरी गुप् संकेतों पर आधारित थी जो  टेनी कहलाती थी !

परसी :- परसी काफी विस्तृत शब्दावली थी , यह मुख्य रूप से संज्ञा पर केंद्रित थी जिसका कोई व्याकरण निश्चित नहीं था और परसी के उपयोग के लिए परसी संज्ञाओं का हिंदी के साथ घालमेल किया जाता था परसी  के कुछ उदहारण निम्नलिखित हैं -



परसी       =       हिंदी
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खुतरया     =     गट्ठर 
कनियाई    =     बटुआ 
गोंड           =     साफा 
कैथी          =     पगड़ी 
पनफटु      =      धोती 
टनाई        =      कोट 
पुजानि     =      लोटा 
ठनकी       =      थाली 
दमड़ी        =      रूपया 
 डंड            = तांबे का सिक्का 
कंपी          =      कौंड़ी 
गुल्ली        =      मोहर 
बरडला      =     बाजूबंद 
पेटी           =     पैजना 
गल्लगा     =     हार 
पिटघिसा   =     स्वर्णहार 
सेआंद       =     सोना 
उबेन         =     चाँदी 
नुकली      =  नाक की कील 
सेत्रा          =     पुस्तक 
गोनिया     =     जूते 
कठारी       =     संदूक 
टेड़ा           =     ताला चाभी 
धरकना     =     दरवाजा 
खोल         =     बनिया की दुकान 
लवानी      =     जंजीर 
बनारी       =     छड़ी 
टोकिया     =    पुलिस 
खाँचना      =    छिपाना 
उको          =    भागो 



टेनी :-  टेनी सांकेतिक चिन्ह या कि इशारों की भाषा थी जो की उठाईगिरी के सफल अभियानों को अंजाम देने के लिएबहुत ही आवश्यक और महत्वपूर्ण थी !


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क्रमशः 






अशोक सूर्यवेदी एड्वोकेट 
मऊरानीपुर झाँसी
284204




Monday, November 14, 2016

एटीएम और शादी

रविवार को दोनों की ऑफिस की छुट्टी थी। विकास जब सुबह 6 बजे ATM पंहुचा तो इसका नंबर था 80 और उसके ठीक पीछे राधा 81वें नंबर पर खड़ी थी। टाइम पास करने के लिए विकास कानो में इयरफोन लगा कर गाने सुन रहा था और राधा अपने मोबाइल पर नागिन सीरियल देख रही थी।

लाइन खिसक कर जब दोनों 65-66 नंबर पर पहुचे तभी राधा के मोबाईल की बैटरी ख़त्म हो गयी और उसका मोबाइल बंद हो गया। विकास अभी भी मजे से इयरफोन कानो में लगाए मजे से गाने सुनने में व्यस्त था। राधा ने धीरे से विकास से कहा- ‘एक्सक्यूज़ मी! क्या आप इयरफोन पे मुझे भी गाने सुनवाएँगे? विकास ने शर्माते हुए कहा- क्यों नहीं और इयरफोन का एक पीस उसकी तरफ बढ़ा दिया।
गाने सुनते सुनाते दोनों 50-51 वें नंबर पर पहुचे तभी विकास का मोबाईल भी डिस्चार्ज हो कर बंद हो गया।

राधा ने विकास से पूछा -आप कहाँ के रहने वाले हो?

विकास – पटना । और आप ?

राधा – धनबाद।

बातें करते करते दोनों 30-29 वें नंबर पर पहुंचे तब तक विकास और राधा 36 गुण और पसंद -नापसंद मिल चुके थे। विकास ने शर्माते और झिझकते हुए अपनी जेब में बचे हुए 10 का नोट निकाला और उस पर ‘I Love You राधा‘ लिख कर राधा के हाथ में थमा दिया। राधा ने घूरते हुए विकास को देखा और उसके गले लग पड़ी।

लाइन में लगे एक पंडित ने अपने पोथी में देखा और चिल्लाते हुए कहा- अद्भुत! ऐसा शुभ मुर्हत तो कई सालों बाद आया है। लोगों के जोर देने पर पंडित ने मंत्रोच्चारण शुरू किया । विकास और राधा ने ATM के 7 चक्कर लगा कर अपने फेरे पुरे किये। लाइन में लगे लोगों ने अपनी अपनी जेब से 10-10 नोट शगुन में देना शुरू कर दिया तब तक दोनों लाइन में 2-3 नंबर पर पहुच चुके थे।

तभी अंदर से निकल कर एक लड़की ने कहा – ATM में कैश ख़त्म हो गया है। फिर विकास और राधा अपने हनीमून ट्रिप पर दूसरे ATM में पैसे ढूंढने निकल पड़े .............

Saturday, November 5, 2016

गढ़ कुंडार

Friday, July 8, 2016

संस्कृताइजेशन

बात उन दिनों की है जब बुंदेलखंड में छुआछुत का ज बोलबाला था , बुंदेलखंड ही क्या पूरा देश इस व्याधि से पीड़ित था आदमी आदमी में जबरजस्त फर्क था वैदिक वर्ण व्यवस्था का स्थान ऊँच नीच में बदल गया था कथित ऊँचे लोगों को नीचे लोगों की परछांई भी अपवित्र कर देती थी , बेचारे निचले तबके के लोग अपने गले में हांडी और पिछवाड़े में झाड़ू लटकाकर चलने पर विवश थे ! हांडी इसलिए कि उनका थूंक पवित्र मार्ग को अपवित्र न कर दे और झाड़ू इसलिए कि उनके स्पर्श से अपवित्र हो रही सड़क पीछे पीछे आप ही पवित्र होती जाये | उच्चवर्णीय लोगों ने पता नही कहाँ से यह सिद्धांत गढ़ रखा था कि "शूद्र के कान में यदि वेद वाक्य पड़ जाये तो उसके कान में  सीसा गर्म करके उड़ेल दो" बेचारे निम्नवर्णी गरीब कथित कुलीनों की दया पर निर्भर थे हांड़ी से थूंक छलक जाये या फिर पिछवाड़े की झाड़ू ऊँची हो जाये तो जान के लाले पड़ जाते थे |
                                   ऐसे ही विकट समय में परम्परागत तरीकों से गाँव में एक धोबी अपना जीवन यापन करता था | धोबी की स्त्री  अर्सा बीते एकमात्र पुत्री रूपा को छोड़कर गुजर गयी  , पुत्री के लिए धोबी ने सौतेली माँ स्वीकार न की और स्वयं ही मनोयोग से पुत्री का पालन पोषण करता रहा | जब पुत्री अपनी आयु को प्राप्त हुई तो उसके हाथ में गजब का रसायन आया और रूपा का रूप लावण्य भी चरमरा कर उभरा , धोबी कन्या के हाथ पीले कर अपना कर्तव्य पूर्ण कर पाता इसके पहले ही ईश्वर का बुलावा आ गया इधर धोबी राम को प्यारा हुआ और उधर रूपा पर विपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा | धोबिन की परछांई से भी जो लोग अपवित्र होते जाते थे आज वे ही उसके साथ एकांत भोगने को लालायित दिखने लगे , कदाचित भद्रों की वासना एकांत में शूद्र स्त्रियों के शरीर में समाने में कोई छूत नही मानती | रूपा का गाँव में जब कथित बड़ी जाति के लोगों के छोटे आचरणों से जीना ही मुहाल हो गया तब अकेली रूपा अपने रूप लावण्य की विरासत बचाने एक रोज रात के चौथे पहर के पहले ही घर गाँव को प्रणाम कर निकल पड़ी और भोर होते होते गाँव से काफी दूर निकल गयी , एक नए जीवन की तलाश में आशा भरी निगाहों से उम्मीदों की डगर नापती रूपा ने बड़े नगर में प्रवेश किया , यहाँ गाँव के जैसी संकीर्णता न थी पर जाति का जहर तो हर कहीं विद्यमान था | गरीब रूपा पर भले लोगों की नजर पड़ी रंग रूप से रूपा ब्राह्मण कन्या सी प्रतीत होती थी सो एक सहृदय  धनिक ने उसे अपने घर में चौका चूल्हा सम्हालने के लिए रख लिया , रूपा ने लोगों के अंदाज के अनुरूप खुद को दीन ब्राह्मण कन्या के तौर पर स्वीकार कर लिया और धोबिन होने को हृदय में गहरे दफ़न कर मनोयोग से अपने नियोक्ता की सेवा में खपा सुख से जीवन बसर करने लगी !
                                 दूर कहीं किसी गाँव में एक सिद्दर नाम का कसाई रहता था | गौरवर्ण सिद्दर का नाम उसके माँ बाप ने श्रीधर रखा था किन्तु कसाई के बेटे को श्रीधर भला कौन कहता ? बेचारा श्रीधर सिद्दर ही स्वीकार किया गया , सिद्दर का गौरवर्ण भी लोगों को फूटी आँख न सुहाता पर उसके रंग पर उस बेचारे का क्या वश था | सिद्दर को पता नही कहाँ से भागवत कथा का ज्ञान प्रकट हो गया और वो मँजरे में कसाईयों को कथा सुनाने लगा | "सिद्दर कसाई भागवत कहता है" जब यह खबर गाँव में फैली तो कथित कुलीनों का पारा चढ़ गया , कसाई ने कथा में सेंधमारी की कथा के ठेकेदार कसाई को जान से मारने के लिए दौड़ पड़े | सिद्दर कसाई भी जान बचाने के लिए गाँव घर द्वार छोड़कर दे भागा  नियति का मारा सिद्दर भी वहीं जा पहुंचा जहाँ पंडितानी बनी धोबिन धनिक के घर का चूल्हा चौका कर अपनी गुजर बसर कर रही थी | सिद्दर कसाई दूध में केशर मिले गौर वर्ण का था सुरीला कंठ और मवाणी के सिद्दर यहाँ श्रीधर आचार्य होकर सुपूजित हुए और कथावार्ता का उनका धंधा यहाँ चल पड़ा  | लोगों की नजर में सिद्दर अनाथ ब्राह्मण था जिसके आगे पीछे कोई न था भले लोगों ने श्रीधर आचार्य और रूपा का घर बसाने का मन बनाया "एक को और नही और दूजे को ठौर नही" सो भले लोगों के तनिक प्रयास से दोनों ब्राह्मणवेशी जातकों की जोड़ी जम गयी |
              रूपा की अपनी घर गृहस्थी और श्रीधर आचार्य का अपना घर परिवार सामाजिक मान्यता प्राप्त ब्राह्मण दंपत्ति की घर गृहस्थी भगवत्प्रेमियों के सहारे चल पड़ी | एकांत के क्षणों में दोनों एक दूसरे की हकीकत से वाकिफ हुए लेकिन जीने के लिए अतीत को दफन करना जरुरी था सो पंडिताई का आवरण कभी न हटाने का संकल्प साध लिया | आचार्य श्रीधर कथा भागवत करके धन सम्मान अर्जित करते और रूपा सुघड़ स्त्री की तरह घर गृहस्थी सहेजती | समय बीता और ब्राह्मणवेशी दंपत्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई हर्षित दंपत्ति ने पुत्र का नाम रखा "गजाधर" ...| गजाधर मान्यताप्राप्त कुलीन घर में जन्मा था इसलिए उसे श्रीधर से सिद्दर नही होना पड़ा वह गजाधर ही रहा | माता पिता का सौंदर्य , विनम्रता और वाक्पटुता गजाधर को विरासत में प्राप्त हुयी थी | गजाधर जब सयाने हुए तो आचार्य श्रीधर ने उन्हें पंडिताई पढ़ने बनारस पंडित ब्रह्मदत्त शास्त्री की विद्यापीठ भेज दिया , गजाधर ने मनोयोग से पूरी लग्न और निष्ठा के साथ गुरुजी की सेवा करते हुए बनारस में अध्ययन किया , मेधावी गजाधर शीघ्र ही संगीत और शास्त्र में निपुण शास्त्री हुआ उसके गुरु भी गजाधर जैसा शिष्य पाकर गौरवान्वित थे ! पंडित ब्रह्मदत्त शास्त्री रसिक प्रवृत्ति के ब्राह्मण थे और उन्होंने गृहस्थी से दूर एक वैश्या रख छोड़ी थी , उस वैश्या से उन्हें एक सुन्दर कन्या तारा प्राप्त हुई थी जिसे वे किसी भी पिता की भांति सुयोग्य हाथों में सौपना चाहते थे , अपने ही शिष्य गजाधर में उन्हें वह सुपात्र नजर आया और उन्होंने अधिकार पूर्वक गजाधर और अपनी पुत्री तारा का पाणिग्रहण संपन्न करा दिया , गजाधर शास्त्री भी गुरुपुत्री का वरण कर प्रसन्न भाव से अपनी पत्नी को लेकर अपने माता पिता के पास लौट आया | हर्षित महतारी ने पुत्रबधू के स्वागत में मंगलगान करवाये , नजर उतारी और सभी शुभचिंतकों को भोज कराया | नेगाचार के उपरान्त शीघ्र ही बहू घर की जिम्मेवारी सम्हाल सास ससुर की सेवा के लिए तत्पर हुई किन्तु सास ससुर उसकी सेवा से बचते बचाते दिखाई देने लगे , बहू पैर छूने को झुके तो सास ससुर बस बस कर बचने लगें , बहू को झूठी थाली धोने को न छोड़ें सेवा टहल के सभी कर्मों से बहू को वंचित करने का प्रयास तारा को समझ न आता बेचारी समझती भी कैसे अभी अभी तो गृहस्थी में शामिल हुई थी | वह सास ससुर के बर्ताव के लिए खुद को दोषी मान अपनी ही गलती ढूंढने का प्रयास करने लगी | तारा के सभी प्रयास बिफल हुए तो हठ पर उतर आई और एक दिन सास ससुर के सामने सेवा को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गयी , सास ससुर ने बहुत समझाया पर बहू ने अन्न का दाना भी मुँह में न दिया तब श्रीधर आचार्य ने बहू पर अपने कसाई होने और रूपा के धोबिन होने का राज खोलते हुए कहा बेटा तुम ब्राह्मणकन्या हो तुम से सेवा सुश्रूषा कराकर हम नरक के गामी नही होना चाहते ! तारा ने भी सास ससुर के सम्मुख खुद के वैश्यापुत्री होने का राज खोलते हुए कहा कि मुझे अपनी सेवा से वंचित न करें तीनों ब्राह्मणवेशी सास ससुर और बहू अब प्रसन्न थे और गजाधर शास्त्री अपने कमरे में से गा रहे थे :-
माता धोबिन बाप कसाई ,और जा वैश्या की जाई , 

गजाधर तीनों की बन आई ,गजाधर तीनों की बन आई !!  


ब कलम

अशोक सूर्यवेदी