Sunday, May 10, 2015

यौद्धेय खंगार

खंगार उत्तर भारत की जुझारू जाति हैं जो मूल रूप से यौद्धेय संघ का आयुधजीवी गण है अपने संघ में अपने खंग आयुध को धारण करने वाले इस गण को "खंग आरोति इति खंगार " के कारण खंगार नाम मिला ! यौद्धेयगण का गौरवशाली इतिहास लगभग एक हजार वर्ष का स्वर्णिम इतिहास है ! इन्ही आयुधजीवी  खंगार यौद्धेय पूर्वजों के प्रबल पराक्रम से सिकंदर की सेनाओं ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था ! यौद्धेय प्राथमिक रूप से पंजाब में निवास करते थे कालचक्र के साथ आयुधजीवी यौद्धेय खंगार पंजाब से राजपूताना और गुजरात होते हुए विंध्य की उपत्यकाओं में बेतवा और धसान के मध्य आकर बस गए किन्तु प्रबल पराक्रमी यौद्धेय खंगार जिस जिस क्षेत्र में प्रवास करते हुए आगे बढे उस क्षेत्र में उनके शौर्य की गाथाएं प्रसिद्ध हो गयी ! पंजाब गुजरात राजस्थान में खंगार शब्द की आदरपूर्वक चर्चा होती है उक्त प्रदेशों की लोक संस्कृति आज भी खंगार को अपने गीतों में अपनी परम्पराओं में अपने नामों में आदरपूर्वक स्थान देती है ! विभिन्न राजपूत जातियों ने आयुधजीवी खंगार वीरों जैसी संतति पाने की लालसा में अपने कुमारों का खंगार नामकरण किया "यथा नाम तथा गुण" होने से बहुधा इन खंगार नामधारी राजाओं के पराक्रमी होने पर उनके वंशज उनके नाम से स्मृत किये जाने लगे और और खंगार नाम धारी महापुरुष की संतति अपनी जाति में खंगार वंशज होने के कारण खंगारौत अथवा खांगर नाम से संबोधित हुई ! विभिन्न राजपूत और अन्य जातियों में आज भी प्रबल पराक्रमी आयुधजीवी खंगारों के नाम पर आज भी बालकों का नाम खंगार रखने की परंपरा है !
गणतंत्र के पालक पोषक आयुधजीवी यौद्धेय खंगार जब स्थायी रूप से बेतवा और धसान के मध्य के भूभाग में आकर बसे तब उन्होंने अपने इस भूभाग का नामकरण अपनी परम्परानुसार "घार" रखा जो कि समूह का उद्घोषक है यह "घार" शब्द यहाँ के स्थानीय निवासियों में आज भी अत्यधिक प्रचलित है !
समुद्रगुप्त की " प्रयाग प्रशस्ति " में इस क्षेत्र को जांगल प्रदेश कहा गया है जिसके स्वामी गणों ने समुद्रगुप्त को प्रणाम से संतुष्ट किया !
कालान्तर में आयुधजीवी खंगार गण बेतवा और धसान के पार क्रमशः केन , सिंध एवं यमुना नदी तक अपने भूभाग का विस्तार करने में सफल रहे और खंगार भूपतियों ने अपने शासित भूभाग का नामकरण 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में "जुझौति" कर लिया जो उनकी जुझारू नीतियों का परिचायक था !
सीमावर्ती चंदेल और परिहार शासकों से खंगार गणनायकों की कभी नही बनी सीमाओं के विस्तार को लेकर उनमे हमेशा ठनी रही !तत्समय दिल्ली के अधीश्वर पृथ्वीराज चौहान से खंगार गणनायक खेतसिंह खंगार ने मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लिए और चौहानों के साहचर्य में चंदेल सत्ता को धूलधूसरित कर दिया ! पृथ्वीराज की ओर से  पज्जुन राय को महोबा का प्रशासक नियुक्त किया गया  और विजित क्षेत्र खंगार नायकों के अप्रत्यक्ष रूप से अधिकार में आगया ! चंदेलों के पराभव ने ग्वालियर के परिहार शासकों को भी सबक दे दिया और उसके बाद उन्होंने कभी खंगार भूमि की ओर आँख उठाकर देखने का दुस्साहस नही किया और  कदाचित खंगारगण से मैत्री सम्बन्ध भी स्थापित कर लिए ..!
कालचक्र में आगे जब 1347 ई. में जुझौति का शासन खंगार गणाधीश्वर महाराज मानसिंह सम्हाल रहे थे तब
राजकुमारी केशर दे के स्वाभिमान और सम्मान की खातिर आयुधजीवी यौद्धेय खंगार अपनी जुझारू नीतियों के पालन पोषण में मुहम्मद तुगलक से युद्धरत हुए इस युद्ध में जुझौति का बच्चा बच्चा अपनी मिटटी की अस्मिता की खातिर जूझ गया ! 9 माह के भीषण युद्ध के बाद खंगार गणसत्ता अपने ही भेदियों के कारण पराभूत हुई ! इस युद्ध की गौरवशाली गाथा आज भी खंगार भूमि के  लोकोत्सव "नारे सुअटा " "जिंझिया" और "टेसू" के गीतों में मुखरित होती है !
जुझौति प्रदेश 1347 ई के इस खंगार तुगलक युद्ध के बाद बीरान होगया भारी उथल पुथल के समय में यौधेय खंगार अपनी आयुधजीवी वृत्ति के कारण सीमावर्ती राज्यों में सैन्य सेवायें देने लगे ! भदावर में शल्यदेव भदौरिया का सेनापति भूपत सिंह खंगार और मालवा में मेंदिनी राय खंगार इस बात के पुष्ट प्रमाण हैं !
दिल्ली में मुग़ल सत्ता स्थापित कर बाबर ने चंदेरी मेदिनी राय से फतह कर ली और इस घटनाक्रम के बाद रुद्रप्रताप बुंदेला को जुझौति का गवर्नर नियुक्त किया ! तदन्तर रुद्रप्रताप ने ओरछा को राजधानी बनाया और जुझौति में बुंदेला राजवंश की स्थापना की ! बुंदेला राजसत्ता में भी आयुधजीवी खंगार सेना में बड़े पदों पर आरूढ़ थे ! ओरछा में राजा जुझार सिंह बुंदेला का सेनापति पहाड़ सिंह और कालान्तर में पन्ना महाराज बुन्देल केशरी छत्रशाल के सेनापति किशोरी खंगार का वर्णन प्राप्त होता है ! मराठा काल में झाँसी की सेना में "कुँवरजी" नामक दल खंगारों का था ऐसा झाँसी के  विद्वान इतिहासकार दावा करते हैं !  1857 का विद्रोह भारत के आमजन का विद्रोह था झाँसी में 1857 का विद्रोह खड़ा करने में लोधी गुसाईं और खंगारों का अविस्मर्णीय योगदान था ! 1857 की  इस बगावत से ब्रिटिश शासन को ये जातियां अत्यधिक खटक गयी थीं और कंपनी सरकार इन लड़ाकू जुझारू स्वतंत्रता प्रेमी जातियों के दमन के लिए "क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट" नामक काला कानून लेकर आई और देश भर की 160 स्वतंत्रता प्रेमी जातियों सहित खंगारों को अपराधी जाति नामित कर खंगार जाति के लोगों को ढूंढ ढूंढ कर इस काले कानून के हवाले किया जाने लगा बहुतेरे खंगार आत्मरक्षार्थ जंगलों में उतर गए और ब्रिटिश सरकार की नाक में दम करते हुए स्वातंत्र्य की अलख जागते रहे ! बहुतों ने ब्रिटिश शासन के मापदंडों पर उनकी शर्तों पर आजीविका चलाना स्वीकार कर ग्राम चौकीदार का पद स्वीकार कर लिया तथापि अंग्रेज खंगार खतरे से भयभीत रहे उन्हें खंगार संगठित होकर फिर क्रांति न कर दे इसका भय सताता रहा अतः उन्होंने एक गांव में एक ही खंगार परिवार बसाया और उसकी बसीकत भी हीनजातियों के साथ कर दी ताकि आगे चलकर उनकी स्वतंत्रता की इच्छा हमेशा हमेशा के लिए मर जाये ! बहुतेरे खंगार परिवारों को उनके हितैषी परिहार परिवारों ने अपनी जाति परिहार बताने के लिए उकसाया और अंग्रेजों के पूंछे जाने पर उन्होंने खंगार परिवारों को परिहार परिवार बताया इस प्रकार कुछ  खंगारों  ने अपनी पहचान तात्कालिक संकट से बचने हेतु छुपाली और खंगारों में परिहार बताने का तात्कालिक उपाय रूढिबद्ध हो गया और खंगार पटिया (भाट) अपने स्वामी खंगारों की प्रशस्ति में उनका कुल गौरव परिहार राजपूतों से जोड़ने की भ्रमित और अतार्किक होड़ में शामिल हो गए और अपने लेखन में  गणतंत्र के पालक पोषक  यौद्धेय खंगारगण के मूल अस्तित्व से भटक गए !
1952 में स्वतंत्र भारत की सरकार ने स्वतंत्रता प्राप्ति के 5 साल बाद ब्रिटिश शासन के दौरान अपराधिक जातियों में नामित खंगार सहित सभी जातियों को विमुक्त जाति अधिनयम बनाकर क्रिमिनल ट्राइब्स नामक काले कानून से मुक्त तो कर दिया किन्तु इन जातियों के उन्नयन के लिए आज तक किसी सरकार ने जमीनी प्रयास नही किये ! पिछली कांग्रेस सरकार ने रेणके कमीशन गठित कर इन जातियों के विकास के लिए रिपोर्ट मांगी थी किन्तु रेणके कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का प्रयास अभी तक किसी ने नही किया .............मेरा एकमात्र सवाल है अंग्रेज तो हमारे दुश्मन थे आप तो हमारे अपने बनाये शासक हो फिर गणतंत्र के पालक पोषक हम स्वतंत्रता प्रेमी यौद्धेय खंगारों और हमारी ही तरह की अन्य यौद्धेय जातियों और स्वंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली वीर संततियों की उपेक्षा कर रहे हो ......???

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*बकलम*
अशोक सूर्यवेदी एड.
9450040227

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