Thursday, March 25, 2010


खंगार घनाक्षरी छंद 
अशोक सूर्यवेदी 
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(१)
हैं  खंगधारी खंगार छोड़ आये तलवार ,
माता कालिके ने मांसी संग भिजवाया है !
खंग शास्त्र वाले हस्त सौंप दिया मसि पत्र,
रक्त हस्त देखिएगा लेखनी थमाया है !
साधना में शारदे की सधे हों जो वीर किन्तु '
स्वाभिमान पे दें जान ये भी सिखलाया है !
देश जाति धर्म पै जो डाले नीच हाँथ कोई ,
काट लेना शीश वीर ये भी समझाया है !!
(२)
शेरों सा है शेर वंश वीरों में है वीर वंश ,
महारुद्र अंश खंगार को नमन है !
नारी की सुरक्षा हित वीरों की परीक्षा हित ,
चमकी जो सदा असिधार को नमन है !
केशर ने जौहर किया मानी स्वाभिमानी थी ,
भस्मी भूत देह अंगार को नमन है !
जूझना परम्परा है जुझौती वसुंधरा है ,
वीरों का है धाम कुंडार को नमन है !
(३)
काशी जैसी  पुन्य भूमि , वीरों की वो वीर भूमि ,
चोरों का है गढ़ हमें ये ना बतलाइए !
राष्ट्र हित धर्म हित उठाया था खड्ग नित ,
गाथा खंगारों की छुपी पर्दा हटाइए !
भारती के पूतो गिरवासनी पुकारती है ,
खेत सिंह जैसे सिंह को ना बिसराइये  !
बुंदेलों का कहा सुना सत्य से है परे सदा ,
अंधी कानी दौड़ में ना कलम लजाइए !
(4 )
कालिंजर कुंडार महोबे पै फहराती जो ,
कीर्ति ध्वजा खंगधारिओं ने फहराई है !
खजुरिया वो खजुराहो कर रहा गुणगान ,
खेत सिंह हैं महान युग नारी हरषाई है !
नंगी भोग्य जो बस्तु बनी थी बाजार की ,
खेत सिंह राज्य पूज्य ध्वजा बनी छाई है !
हुए जन बिह्वल गायें सब करतल ,
हमें तो सत्ता श्रेष्ठ खंगारों की ही आई है !
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